महंगा कच्चा तेल और सूखे की दोहरी मार,क्या भारत में और बढ़ेगी महंगाई,जेब पर ऐसे पड़ेगा सीधा असर
महंगा कच्चा तेल और सूखे की दोहरी मार,क्या भारत में और बढ़ेगी महंगाई,जेब पर ऐसे पड़ेगा सीधा असर

29 Oct 2026 |   21



 

धनंजय सिंह।भारत की अर्थव्यवस्था के सामने इस समय दो बड़ी समस्या है।पहली समस्या अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और दूसरी मानसून के कमजोर रहने से सूखे का खतरा।दोनों समस्याएं अलग-अलग जरूर हैं,लेकिन जब एक साथ सामने आती हैं,तो इनका असर देश की अर्थव्यवस्था से लेकर रसोई तक दिखता है।महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल को बढ़ाता है,इससे परिवहन से लेकर खेती तक की लागत पर दबाव पड़ता है।वहीं बारिश की कमी से फसलों की पैदावार प्रभावित होने,किसानों की आमदनी घटने और खाने-पीने की चीजों के महंगे होने का खतरा बढ़ जाता है।ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि भारत के लिए चिंता की बात ज्यादा क्या है।महंगा कच्चा तेल,सूखा या फिर इन दोनों का एक साथ असर।आर्थिक आंकड़ों पर नजर डालें तो साफ होता है कि असली चुनौती इन दोनों समस्याओं के एक साथ बढ़ने से पैदा हो रही है।

भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है।इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात खर्च पर पड़ता है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2026-27 की पहली छमाही यानी अप्रैल से सितंबर के दौरान भारत का कच्चे तेल का आयात बिल बढ़कर 90.6 अरब डॉलर पहुंच गया। एक साल पहले इसी अवधि में यह 61.9 अरब डॉलर था। खास बात यह है कि इस दौरान कच्चे तेल के आयात की मात्रा में एक प्रतिशत से भी कम की बढ़ोतरी हुई।

इसका मतलब है कि आयात बिल में तेज उछाल के पीछे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी की बड़ी भूमिका रही।आंकड़ों के मुताबिक अक्टूबर में अब तक भारतीय कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 120 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि जुलाई में यह लगभग 82 डॉलर प्रति बैरल थी। इससे भारत को पहले के मुकाबले तेल खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ रही है। इसका असर देश के व्यापार संतुलन और रुपये की विनिमय दर पर भी पड़ सकता है।

कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में दिखाई देता है।ट्रक,बस और दूसरे मालवाहक वाहनों के ऑपरेशन की लागत बढ़ सकती है,खेतों से मंडियों और मंडियों से दुकानों तक सामान पहुंचाने का खर्च बढ़ सकता है,डीजल से चलने वाले पंप,ट्रैक्टर और दूसरे कृषि उपकरणों का इस्तेमाल महंगा पड़ सकता है।फैक्ट्रियों और अन्य उद्योगों को उत्पादन और माल की ढुलाई पर ज्यादा खर्च करना पड़ सकता है। हालांकि, कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि पेट्रोल और डीजल के खुदरा दाम तुरंत उसी अनुपात में बढ़ जाएंगे। सरकार के टैक्स,रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों की मूल्य निर्धारण नीति भी इसमें अहम भूमिका निभाती है।अगर पेट्रोल-डीजल के दाम स्थिर रहते हैं, तब भी महंगे तेल का आर्थिक बोझ कहीं और पड़ सकता है। कंपनियां अपने मुनाफे में कटौती कर सकती हैं या धीरे-धीरे बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा ग्राहकों से वसूल सकती हैं।

एक तरफ महंगा तेल भारत के खर्च को बढ़ा रहा है,तो दूसरी तरफ कमजोर मानसून कृषि क्षेत्र की मुश्किलें बढ़ा सकता है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा अब भी बारिश पर निर्भर है। समय पर और पर्याप्त बारिश नहीं होने से मिट्टी में नमी कम हो सकती है,जलाशयों में पानी घट सकता है और फसलों की पैदावार प्रभावित हो सकती है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों के मुताबिक जून से सितंबर के मानसून सीजन में देश में सामान्य से 12.6 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। कम बारिश का असर केवल खरीफ फसल तक सीमित नहीं रहता। अगर जलाशयों और जमीन के नीचे मौजूद पानी का स्तर गिरता है,तो किसानों के लिए अगली रबी फसल की बुवाई और सिंचाई करना भी मुश्किल हो सकता है।गेहूं,सरसों,चना और दूसरी रबी फसलों की बुवाई के समय पर्याप्त नमी और सिंचाई का पानी उपलब्ध होना जरूरी है। पानी की कमी होने पर किसानों को अतिरिक्त खर्च करना पड़ सकता है या उन्हें कम क्षेत्र में खेती करनी पड़ सकती है।

केंद्रीय जल आयोग के 22 अक्टूबर के आंकड़ों के अनुसार, देश के 178 निगरानी वाले प्रमुख जलाशयों में जल भंडारण उनकी कुल क्षमता का 66.7 प्रतिशत था,लेकिन दक्षिण भारत के 50 निगरानी वाले जलाशयों की स्थिति अधिक चिंताजनक रही। इनमें जल भंडारण 42.34 प्रतिशत था, जबकि पिछले 10 सालों का इसी अवधि का औसत 77.94 प्रतिशत रहा है। यह अंतर बताता है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में पानी की उपलब्धता एक जैसी नहीं है।राष्ट्रीय स्तर पर जलाशयों में पर्याप्त पानी दिखाई देने के बावजूद कुछ क्षेत्रों के किसानों को सिंचाई के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ सकता है। जलाशयों के ये आंकड़े देश के सभी कुओं, नदियों और सिंचाई स्रोतों की स्थिति नहीं बताते। फिर भी जिन क्षेत्रों में बारिश कम हुई है और जलाशयों में पानी घटा है, वहां खेती पर दबाव बढ़ने की आशंका बनी हुई है।

भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता इन दोनों समस्याओं का एक साथ सामने आना है। अगर फसल की पैदावार घटती है और उसी समय डीजल महंगा होता है, तो किसानों की लागत बढ़ सकती है और बाजार तक कृषि उत्पाद पहुंचाने का खर्च भी अधिक हो सकता है। इसका असर कई स्तरों पर दिखाई दे सकता है।

पहला असर किसानों की आमदनी पर पड़ेगा। कम बारिश के कारण अगर फसल खराब होती है, तो किसानों के पास बेचने के लिए कम उपज होगी। ऐसे में बाजार में कुछ फसलों की कीमत बढ़ने के बावजूद किसानों की कुल कमाई घट सकती है।दूसरा असर आम परिवारों के बजट पर होगा। अगर सब्जियों,अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ती हैं, तो परिवारों को रोजमर्रा के खर्च के लिए अधिक पैसा खर्च करना पड़ेगा। इसके साथ ही परिवहन और दूसरी सेवाओं की लागत बढ़ने से घरेलू बजट पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
तीसरा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर हो सकता है। खेती से आमदनी कम होने पर ग्रामीण परिवार कपड़े,वाहन,घरेलू उपकरण और अन्य सामानों पर खर्च घटा सकते हैं। इससे उन कारोबारों पर भी असर पड़ सकता है, जो ग्रामीण मांग पर निर्भर हैं। हालांकि, महंगाई पर इन दोनों कारकों का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल की कीमतें कितने समय तक ऊंची रहती हैं, फसल उत्पादन कितना प्रभावित होता है और सरकार आपूर्ति को बेहतर बनाए रखने के लिए क्या कदम उठाती है।

महंगे तेल और कमजोर मानसून की चिंता ऐसे समय बढ़ रही है, जब खुदरा महंगाई में भी तेजी दर्ज की गई है। दिए गए सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में खुदरा महंगाई दर बढ़कर 5.54 प्रतिशत हो गई, जबकि अगस्त में यह 4.83 प्रतिशत थी। खाद्य महंगाई दर भी अगस्त के 5.97 प्रतिशत से बढ़कर सितंबर में 7.74 प्रतिशत पहुंच गई। खाद्य महंगाई में बढ़ोतरी का मतलब है कि आम लोगों को खाने-पीने की वस्तुओं के लिए पहले के मुकाबले ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है। हालांकि, यह मानना सही नहीं होगा कि खाद्य महंगाई में हुई पूरी बढ़ोतरी सिर्फ कमजोर मानसून के कारण है। मौसमी बदलाव, बाजार में आपूर्ति और पिछले साल की कीमतें भी इसमें भूमिका निभाती हैं। फिर भी अगर बारिश की कमी के कारण कृषि उत्पादन प्रभावित होता है और महंगे ईंधन से परिवहन लागत बढ़ती है, तो खाद्य महंगाई पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक विकास की रफ्तार बनाए रखने की होगी। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ती है। वहीं खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ने पर आम लोगों की खरीदने की क्षमता प्रभावित होती है। ऐसी स्थिति में केंद्रीय बैंक के लिए ब्याज दरों से जुड़े फैसले लेना आसान नहीं रहता। आरबीआई ने 7 अक्टूबर को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी करते हुए इसे 5.50 प्रतिशत कर दिया था। उसकी मौद्रिक नीति में कमजोर बारिश, अल नीनो और ऊर्जा की ऊंची कीमतों को महंगाई के लिए जोखिम के रूप में रेखांकित किया गया था।

रेपो रेट वह दर है, जिस पर आरबीआई बैंकों को अल्पकालिक धन उपलब्ध कराता है। इसमें बदलाव का असर समय के साथ होम लोन, कार लोन और दूसरे कर्ज की ब्याज दरों पर पड़ सकता है,लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। ब्याज दर बढ़ाने से बारिश नहीं बढ़ सकती और न ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सीधे कम हो सकती है। इसका उद्देश्य महंगाई के व्यापक और लंबे समय तक बने रहने वाले प्रभाव को सीमित करना है। दूसरी तरफ ब्याज दरें अधिक रहने से कर्ज लेना महंगा हो सकता है। इससे घर खरीदने, वाहन खरीदने और कारोबार में निवेश करने की गति प्रभावित हो सकती है। यानी आरबीआई को महंगाई और विकास के बीच संतुलन बनाना होगा।

भारत के पास इस दोहरे दबाव को कम करने के कुछ विकल्प हैं।अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होने से आयात बिल को राहत मिल सकती है।जरूरत पड़ने पर सरकारी भंडार और आपूर्ति प्रबंधन के जरिए बाजार में उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।सिंचाई, फसल बीमा और जरूरत के अनुसार राहत उपाय किसानों को नुकसान से उबरने में मदद कर सकते हैं।जलाशयों, भूजल और उपलब्ध सिंचाई संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल अगली फसल के लिए महत्वपूर्ण होगा।
आरबीआई और सरकार को ऊर्जा की कीमतों, खाद्य महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर लगातार नजर रखनी होगी।

इसके अलावा आरबीआई ने 12 अक्टूबर से 3 सरकारी तेल कंपनियों इंडियन ऑयल,भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम की डॉलर संबंधी दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए विशेष व्यवस्था शुरू की थी। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार पर पड़ने वाले दबाव को कम करने में मदद करना है। हालांकि, इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता नहीं हो जाता।

मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार अक्टूबर से दिसंबर के दौरान दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में उत्तर-पूर्वी मानसून की बारिश सामान्य रहने की संभावना जताई गई है। यह उन क्षेत्रों के लिए राहत की उम्मीद पैदा करता है, जहां आने वाले महीनों में बारिश और पानी की उपलब्धता रबी फसलों के लिए महत्वपूर्ण होगी। हालांकि, सामान्य बारिश का पूर्वानुमान यह गारंटी नहीं देता कि हर सूखाग्रस्त जिले में पर्याप्त पानी पहुंच जाएगा। तेल की कीमतों में गिरावट भी भारत को राहत दे सकती है। इससे आयात बिल, परिवहन लागत और कंपनियों के खर्च पर दबाव कम हो सकता है। 

भारत के सामने इस समय महंगा कच्चा तेल और कमजोर मानसून,दोनों ही बड़ी आर्थिक चुनौतियां हैं। महंगा तेल देश के विदेशी मुद्रा खर्च और उत्पादन लागत को बढ़ाता है, जबकि सूखा किसानों की आमदनी, फसल उत्पादन और खाद्य कीमतों को प्रभावित कर सकता है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं और पानी की कमी के कारण अगली फसल भी प्रभावित होती है, तो आम लोगों के खर्च पर दोहरा दबाव पड़ सकता है।

इसका असर ग्रामीण मांग,कारोबार और महंगाई पर भी दिखाई दे सकता है। इसलिए भारत के लिए सवाल यह नहीं है कि महंगा तेल ज्यादा बड़ी समस्या है या सूखा। असली चिंता यह है कि दोनों समस्याएं एक साथ कितने समय तक बनी रहती हैं और सरकार उन्हें कम करने के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई करती है। आने वाले महीनों में कच्चे तेल की कीमतें, जलाशयों में पानी का स्तर, रबी फसलों की बुवाई और खाद्य महंगाई के आंकड़े यह तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे कि भारतीय अर्थव्यवस्था इस दोहरे दबाव से कितनी जल्दी उबर पाती है।

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