जलेसर यूरिया कालाबाजारी का काला साम्राज्य:छोटी मछलियां पकड़कर क्या बड़े मगरमच्छों को बचा रहा प्रशासन, स्रोत पर सन्नाटा,सप्लाई चेन पर रहस्यमयी चुप्पी
जलेसर यूरिया कालाबाजारी का काला साम्राज्य:छोटी मछलियां पकड़कर क्या बड़े मगरमच्छों को बचा रहा प्रशासन, स्रोत पर सन्नाटा,सप्लाई चेन पर रहस्यमयी चुप्पी

27 Jun 2026 |   12



 

तुर्रम सिंह राजपूत✍️

एटा।जलेसर में सरकारी सब्सिडी वाले यूरिया की कथित कालाबाजारी के मामले में प्रशासन द्वारा एफआईआर दर्ज किए जाने को भले ही बड़ी कार्रवाई के रूप में प्रचारित किया जा रहा हो,लेकिन पूरे प्रकरण में कई ऐसे गंभीर प्रश्न हैं,जिनका उत्तर अब तक सामने नहीं आया है। यही कारण है कि यह कार्रवाई वास्तविक नेटवर्क तक पहुंचने के बजाय केवल निचले स्तर तक सीमित दिखाई दे रही है।

जांच के दौरान सकरा कानउ मोड़ स्थित एक फैक्ट्री परिसर से सरकारी यूरिया को निजी बोरियों में भरने,भारी मात्रा में यूरिया,खाली कट्टों और सिलाई मशीन की बरामदगी के बाद 11 व्यक्तियों के विरुद्ध उर्वरक नियंत्रण आदेश एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया गया।मगर सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब भी अनुत्तरित है,सरकारी यूरिया आखिर आया कहां से,क्या यह यूरिया किसी सरकारी गोदाम, अधिकृत विक्रेता,परिवहन श्रृंखला या किसी बड़े संगठित नेटवर्क से निकला,यदि हां तो उस स्रोत की पहचान क्या हुई, क्या संबंधित अधिकारियों,आपूर्ति तंत्र या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका की जांच की जा रही है।इन सवालों पर अब तक कोई स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई है।

स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह चर्चा रही है कि बड़ी मात्रा में यूरिया का उपयोग कथित रूप से औद्योगिक एवं रासायनिक इकाइयों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है। यदि ऐसी आशंकाएं सही हैं, तो केवल पैकिंग स्थल पर कार्रवाई कर देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता।आवश्यकता इस बात की है कि पूरी सप्लाई चेन,परिवहन व्यवस्था,ट्रकों की आवाजाही और संभावित लाभार्थियों की भी निष्पक्ष जांच की जाए।

डीएम ने कहा है कि जनहित से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की अनियमितता बर्दाश्त नहीं की जाएगी।अब लोगों की अपेक्षा है कि यह संदेश केवल प्रेस विज्ञप्तियों तक सीमित न रहे,बल्कि वास्तविक कार्रवाई के रूप में भी दिखाई दे। यदि जांच केवल मौके पर मौजूद लोगों तक सीमित रह गई और कथित मुख्य सप्लायर,वित्तपोषक या संगठित नेटवर्क तक नहीं पहुंची, तो कार्रवाई की प्रभावशीलता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।

 इस पूरे मामले में प्रशासन से लोग जानना चाहते हैं।सरकारी यूरिया का वास्तविक स्रोत क्या है और उसे ट्रेस करने में क्या प्रगति हुई,क्या पूरे सप्लाई नेटवर्क और संभावित बड़े लाभार्थियों की जांच की जा रही है,संदिग्ध परिवहन एवं औद्योगिक इकाइयों की निगरानी और जांच कब तक होगी,यदि सरकारी सब्सिडी वाला यूरिया किसानों तक पहुंचने के बजाय अन्यत्र जा रहा है, तो इसके लिए जवाबदेही किसकी तय होगी।

किसानों को निर्धारित दरों पर यूरिया उपलब्ध कराने की सरकारी व्यवस्था तभी प्रभावी मानी जाएगी जब कालाबाजारी की पूरी श्रृंखला का पर्दाफाश हो और दोषियों के विरुद्ध बिना किसी भेदभाव के कठोर कार्रवाई की जाए। अन्यथा यह धारणा और मजबूत होगी कि कार्रवाई केवल सुर्खियां बनाने तक सीमित रही, जबकि असली नेटवर्क अब भी कानून की पकड़ से बाहर है।

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