लखनऊ।सूचना के जंग पर होने वाली अधिकांश चर्चा फेक न्यूज,डीपफेक और आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) द्वारा निर्मित सामग्री के इर्द गिर्द रहती है,जिसे झूठ फैलाने के लिए गढ़ा जाता है।ये खतरे असली तो हैं,लेकिन गुजरे जमाने की बात बनते जा रहे हैं।आज सूचना जंग दिमाग को हथियार बनाने वाले अधिक परिष्कृत जंग की शक्ल ले रहा है,जिसका मकसद लोगों को किसी झूठी कहानी पर यकीन दिलाना ही नहीं है बल्कि यथार्थ को देखने का उनका तरीका ही बदल देना है।इसके लिए वे जिस पर ध्यान देते हैं,जिस पर विश्वास करते हैं,साक्ष्यों को जैसे तोलते हैं और जिस तरह फैसले लेते हैं, सीधे उन पर ही असर डाला जाता है।अब केवल सूचना नहीं बल्कि इंसानी दिमाग और फैसले लेने के लिए उसमें चलने वाली प्रक्रियाएं जंग का मैदान बन गई हैं।
जेनरेटिव एआई से भरोसेमंद लगने वाली फर्जी सामग्री बिना खर्च तैयार हो जाती है,लेकिन असली बदलाव प्रौद्योगिकी में नहीं बल्कि रणनीति में आया है।प्रभावित करने वाले आधुनिक तरीकों में अक्सर झूठ नहीं गढ़े जाते।वे सियासी असहमति, आर्थिक चिंताओं या संस्थाओं पर अविश्वास जैसी आधुनिक सामाजिक दरारें पहचानते हैं और उन्हें बिल्कुल वैसे ही बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं,जैसे मैग्नीफाइंग ग्लास किसी दरार को बड़ा दिखा देता है।
इस तरह सच का कोई एक हिस्सा इतना बड़ा बना दिया जाता है कि वही सच लगने लगता है।यहां मकसद कोई नई दरार बनाना नहीं है बल्कि लोगों का ध्यान पहले से मौजूद दरार की ओर ले जाना है और नजर के धोखे की तरह उसे बड़ा दिखा देना है।गढ़ी हुई झूठी बात से ज्यादा मुश्किल है बढ़ाकर बताई गई बात से मुकाबला करना,क्योंकि यह बात पहले से मौजूद सच पर आधारित होती है।गढ़ी हुई बात को आखिर में गलत साबित किया जा सकता है।बढ़ा चढ़ाकर कही बात में सच वही रहता है, लेकिन उसके एक हिस्से को ही बार-बार बढ़ाकर दिखाने से हमारी धारणा इस बारे में बदल जाती है कि जरूरी क्या है, सही क्या है और तात्कालिक क्या है।
यह बदलाव सोशल मीडिया के नए रूप से भी साबित हुआ है। एक दशक पहले सोशल मीडिया मुख्यतः लोगों को उनके दोस्तों और उन अकाउंट्स से जोड़ते थे,जिन्हें लोग खुद चुनते थे।आज सोशल मीडिया ही तय करती है कि उपयोगकर्ता क्या देखें।टिक टॉक ने शॉर्ट वीडियो और अपने फॉर यू फीड के जरिये सोशल मीडिया को बदल दिया।इस फीड में एल्गोरिद्म सामग्री इस आधार पर नहीं सुझाते हैं कि उसे किसने बनाया है बल्कि यह देखकर सुझाते हैं कि वह कितना ध्यान खींच सकती है।इंस्टाग्राम रील्स,यूट्यूब शॉर्ट्स और एक्स भी इसी मॉडल पर चले हैं।
यह बात मायने रखती है,क्योंकि इंसानी दिमाग लिखे हुए के बजाय चेहरों,आवाजों और चलती-फिरती छवियों पर ज्यादा तीव्र और भावुक प्रतिक्रिया देता है।अनंत स्क्रॉलिंग,ऑटो-प्ले और आसान शेयरिंग के साथ सामग्री सुझाने की इस प्रणाली ने सोशल नेटवर्क्स को अटेंशन नेटवर्क्स में बदल दिया है, जिससे बातों को ज्यादा तेजी से,ज्यादा दूर तक और ज्यादा ताकत के साथ फैलाया जा सकता है।
सोशल मीडिया ने ये नई ईजादें उपयोगकर्ताओं को अधिक समय तक जोड़ने के लिए पेश की थीं,सूचना की जंग करने के लिए नहीं।फिर भी उन्होंने दिमाग और समझ को प्रभावित करने का अभूतपूर्व ढांचा तैयार कर दिया है। सामग्री अब इसलिए कम फैलती है कि कौन उसे शेयर कर रहा है बल्कि इसलिए फैलती है क्योकि एल्गोरिद्म को लगता है कि वह ध्यान खींचे रखेगी। चूंकि आक्रोश ज्यादा लोगों को जोड़ता है,इसलिए भावनाओं से भरी सामग्री संतुलित सामग्री से ज्यादा दूर तक पहुंच जाती है।
दिमाग और समझ का जंग एक कदम आगे जाती है। बढ़ाकर दिखाई गई बात ध्यान खींचती है मगर दिमागी जंग निर्णय लेने की क्षमता ही कम कर देती है। अब मकसद यह नहीं रह गया है कि लोगों को कोई बात स्वीकार करने के लिए मनाया जाए बल्कि मकसद किसी बात को आंकने का उनका आत्मविश्वास ही खत्म कर देना है।कल्पना कीजिए कि रोजाना आपके सामने अंतहीन वीडियो,विशेषज्ञों के दावे,प्रति दावे,छेड़छाड़ की गई तस्वीरें,संदर्भ से काटकर पेश की गई असली फुटेज, एआई-निर्मित सामग्री और गढ़े हुए फैक्ट-चेक आएं।
व्यक्तिगत रूप से इनमें से बहुत कुछ अविश्वसनीय लग सकता है,लेकिन सामूहिक रूप से यह भ्रम पैदा करता है। धीरे-धीरे लोग यह पूछना बंद कर देते हैं कि सच क्या है और यह पूछने लगते हैं कि क्या किसी बात पर भरोसा किया जा सकता है। यही बदलाव रणनीतिक उद्देश्य है।दुश्मन के लिए किसी खास झूठ पर भरोसा करने वाली आबादी से ज्यादा काम की वह आबादी होती है,जो किसी पर भी भरोसा नहीं करती।खास झूठ पर भरोसा करने वाली आबादी को इकट्ठा करना,भरोसा दिलाना या संकट के समय एकजुट करना ज्यादा मुश्किल होता है।
दिमाग या समझ की लड़ाई को यही बात पारंपरिक प्रचार यानी प्रोपगंडा से अलग करता है। प्रोपगंडा का मकसद एक धारणा को हटाकर उसकी जगह दूसरी धारणा लाना है। समझ की जंग का मकसद सच पहचानने की क्षमता ही कमजोर करना है।प्राकृतिक आपदा का ही उदाहरण ले लीजिए। आम तौर पर अधिकारी जगह छोड़ने को कहें तो फौरन कार्रवाई होती है।अगर लोग लंबे समय तक आपदा सिर पर होने के छेड़े गए वीडियो देखते रहें तो वे हिचक सकते हैं। क्या चेतावनी असली है,क्या आधिकारिक अकाउंट हैक हो गया है,यह देरी ही जान ले सकती है।अब ज़ंग का मैदान केवल सूचना नहीं है। यह मानव निर्णय है।
एआई इस बदलाव को रफ्तार दे रहा है,यह हजारों मनचाहे संदेश तैयार कर सकता है,पहचान सकता है कि कौन सी बात से सबसे ज्यादा जुड़ाव होगा और उन्हें अलग-अलग दर्शकों, भाषाओं और भावनाएं उभारने वाले तत्वों के हिसाब से बदलता रह सकता है।इस प्रकार असर डालने का काम ठहरे हुए अभियान के बजाय खुद को लगातार ढालने वाली प्रणाली बन जाता है।
अगला चरण है एजेंटिक एआई। इसमें अकाउंट्स का नेटवर्क मानव नहीं संभालेगा बल्कि खुद चलने वाले एआई एजेंट लाखों निजी वार्तालाप को अंजाम देंगे,व्यक्तिगत प्रतिक्रिया के हिसाब से खुद को बदलेंगे,समय के साथ भरोसा जीतेंगे और धीरे-धीरे चुनिंदा बातों को आगे तक फैलाएंगे।दिमाग और समझ की जंग सतत,संवादात्मक तथा बेहद व्यक्तिगत हो जाएगा।इसके निहितार्थ बहुत बड़े हैं।जन विश्वास एक रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति है और जानबूझकर बढ़ाई गई बात से असली सार्वजनिक चिंताओं को अलग कर लेने की नागरिकों की क्षमता संकट के दौरान किसी राष्ट्र की मजबूती को प्रभावित करती है।
प्रौद्योगिकी,विनियमन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग आवश्यक होंगे,लेकिन इनमें से कोई भी एआई के जरिये असर डालने के अभियानों की रफ्तार और विस्तार के साथ कदमताल नहीं कर सकता। जिस तरह पिछली पीढ़ियों ने सीमाओं की रक्षा के लिए सैन्य शक्ति और डिजिटल ढांचे की रक्षा के लिए साइबर ताकत तैयार की,उसी तरह इस युग में दिमाग और समझ को मजबूत बनाने की जरूरत है ताकि लोकतांत्रिक निर्णय की रक्षा की जा सके।
सबसे टिकाऊ रक्षा दिमाग और समझ को मजबूत बनाने में निहित है।इसमें लोगों को सिखाना होगा कि बात को कैसे बढ़ाकर दिखाया जाता है, संचार के विश्वसनीय तरीकों को मजबूत करना होगा और मतभेद होने पर भी सम्मान के साथ संवाद को बढ़ावा देना होगा।फिनलैंड के मीडिया साक्षरता मॉडल का अध्ययन किया जा सकता है।सूचना की जंग जब समझ के जंग में बदल रही है तो पहली रक्षा पंक्ति केवल सीमा नहीं है बल्कि जानकारी से लबरेज लोग हैं। भरोसा करने से पहले रुकें, कुछ भी साझा करने से पहले भी रुकें।