झांसी में होती है अनोखी होली,महिलाओं की लट्ठ,पुरुषों की ढाल,600 साल पुरानी है परंपरा
झांसी में होती है अनोखी होली,महिलाओं की लट्ठ,पुरुषों की ढाल,600 साल पुरानी है परंपरा

06 Mar 2026 |   38



 

झांसी।होली के रंग पूरे देश में अलग-अलग अंदाज में बिखरते हैं,लेकिन बुंदेलखंड के झांसी के पास बसे डगरवाहा गांव में होली का रंग कुछ खास ही होता है,यहां होली सिर्फ गुलाल तक सीमित नहीं रहती,बल्कि महिलाओं के लट्ठ और पुरुषों की ढाल के बीच सदियों पुरानी परंपरा जीवंत हो उठती है।

डगरवाहा गांव में मनाई जाने वाली लट्ठमार होली आज भी उसी उत्साह के साथ मनाई जाती है,जैसी वर्षों पहले होती थी। खाती बाबा के स्थान पर होने वाली इस अनोखी होली में महिलाएं लट्ठ लेकर खड़ी होती हैं और पुरुष हुरियारे बनकर ढाल के सहारे उनसे बचते हुए गुड़ की पोटली तोड़ने की कोशिश करते हैं।इस अनोखे आयोजन को देखने के लिए हर साल बुंदेलखंड के सैकड़ों गांवों से हजारों लोग यहां पहुंचते हैं।यह परंपरा बुंदेलखंड की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है और हर साल होली पर दौज के दिन इसका भव्य आयोजन होता है।

डगरवाहा गांव के प्रधान प्रतिनिधि रईस यादव ने बताया कि यह परंपरा लगभग छह सौ वर्ष पुरानी है। इस आयोजन में खाती बाबा के स्थान पर महिलाएं लट्ठ लेकर खड़ी होती हैं, जबकि पुरुष हुरियारे बनकर खेलते हैं। उन्होंने बताया कि 
ऐसा माना जाता है कि यदि गांव की महिलाएं इस लट्ठमार होली में हिस्सा नहीं लेतीं तो खाती बाबा नाराज होकर उनके घरों में बिच्छू या ततैया भेज देते हैं।इसी कारण गांव की महिलाएं इस परंपरा में अवश्य भाग लेती हैं।

राईस यादव ने बताया कि इस आयोजन के दौरान करीब 51 फीट की ऊंचाई पर गुड़ और ईनाम की पोटली बांधी जाती है। हुरियारे उसे तोड़ने की कोशिश करते हैं,जबकि महिलाएं लट्ठ से उन्हें रोकती हैं,परंपरा के अनुसार गुड़ की पोटली यादव समाज द्वारा बांधी जाती है और परिहार समाज के लोग उसे तोड़ते हैं। उन्होंने बताया कि इस अनोखी होली को देखने के लिए बुंदेलखंड के करीब 100 से 150 गांवों से हजारों लोग हर साल डगरवाहा पहुंचते हैं।

डगरवाहा गांव के मनीष यादव ने बताया कि यहां बरसाने की तर्ज पर लट्ठमार होली खेली जाती है,जिसकी परंपरा लगभग 600 से 700 साल पुरानी मानी जाती है।यह आयोजन गढ़ी में स्थित खाती बाबा के स्थान से जुड़ा हुआ है। उन्होंने बताया कि यह कार्यक्रम शाम करीब साढ़े चार बजे शुरू होकर साढ़े छह बजे तक चलता है।इस दौरान महिलाएं लट्ठ से प्रहार करती हैं, जबकि पुरुष ढाल लेकर अपना बचाव करते हैं।हर साल इस आयोजन में करीब 50-60 महिलाएं और 100-150 पुरुष हिस्सा लेते हैं।

लट्ठमार होली में शामिल महिला देववती ने कहा कि यह डगरवाहा क्षेत्र की पारंपरिक बुंदेलखंडी लट्ठमार होली है,जो कई बरसों से यहां खेली जाती रही है।उन्होंने कहा कि पूरे गांव की महिलाएं इसमें भाग लेती हैं और लाठियों से खेलते हुए इस परंपरा को निभाती हैं।

डगरवाहा गांव की ममता ने बताया कि उनके गांव में खाती बाबा के स्थान पर फाग की दूज के दिन अनोखी होली खेली जाती है।इस दौरान महिलाएं फाग गाती हैं और पुरुष गुड़ वाली पोटली तोड़ने की कोशिश करते हैं। उन्होंने बताया कि महिलाएं बांस की लाठियां चलाकर उन्हें रोकती हैं,जिससे पुरुष आसानी से गुड़ नहीं तोड़ पाते।यह लट्ठमार होली बुंदेलखंड की लोक संस्कृति,आस्था और परंपरा का अनोखा संगम है।

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