लखनऊ को क्यों कहा जाता है मिनी ईरान,खामेनेई की मौत पर यूपी में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन
लखनऊ को क्यों कहा जाता है मिनी ईरान,खामेनेई की मौत पर यूपी में सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन

02 Mar 2026 |   31



ब्यूरो धीरज कुमार द्विवेदी 

लखनऊ।अमेरिका-इजरायल के हमले में मारे गए ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को लेकर भारत में शिया समुदाय के लोग सड़क पर उतरकर विरोध प्रदर्शन कर रहे।दिल्ली से लेकर कश्मीर तक खामेनेई की हत्या को गैरकानूनी और अनैतिक बताते हुए लोग विरोध कर रहे है, लेकिन खामेनेई की मौत का सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन उत्तर प्रदेश में हो रहा है।

लखनऊ,बाराबंकी,मुजफ्फरनर,सहारनपुर,अमरोहा और जौनपुर समेत उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों में शिया समुदाय के लोग सड़क पर उतरकर अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपना आक्रोश जाहिर किया।शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जव्वाद ने तीन दिन के शोक का ऐलान किया है,जिससे अगले तीन दिनों तक यूपी में मुस्लिम समुदाय के लोग खामेनेई की मौत के दुख में अपने काम काज को पूरी तरह से बंद रखंगे।

बड़ा सवाल ये उठता है कि ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश में क्यों देखा जा रहा है।ईरान के साथ अपने मजबूत धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों के लिए लखनऊ जाना जाता है।यही कारण है कि लखनऊ को मिनी ईरान भी कहा जाता है।

खामेनेई की मौत के बाद शिया समुदाय का लगातार उत्तर प्रदेश के अलग-अलग शहरों में विरोध प्रदर्शन जारी हैं।शिया समुदाय की आबादी वाले लखनऊ,जौनपुर,आजमगढ़, गाजीपुर,मुजफ्फरनगर,मेरठ,अमरोहा और बाराबंकी सहित तमाम शहरों और कस्बे में बड़ी संख्या में लोग अमेरिका और इजरायल के मुर्दाबाद के नारे लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया। 

यूपी के कई शहरों में शिया समुदाय ने अमेरिका और इजरायल की कायराना हरकत बताते हुए कड़ा विरोध जता रहे हैं।महिलाओं और पुरूषों ने खामेनेई को शोक में मातम किया,इस दौरान खामेनेई जिंदाबाद और अमेरिका- इजरायल मुर्दाबाद के नारे लगाए जा रहे हैं।इतना ही नहीं ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड की तरफ से यूपी में तीन दिवसीय शोक की घोषणा कर दी गई है।

शिया बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास ने कहा कि अयातुल्ला अली खामेनेई की हत्या के दुख में मुस्लिम समुदाय के लोग तीन दिन तक लोग अपने घरों पर काले झंडे लगाएंगे और काले कपड़े पहनेंगे,इस दौरान खामेनेई के नाम पर रोजाना मजलिस (शोकसभा) का भी आयोजन किया जाएगा।

लखनऊ के चौक इलाके में लगातार दूसरे दिन भी अमेरिका और इजरायल के खिलाफ विरोध जारी है।इस दौरान खामेनेई के लिए मजलिस का आयोजन होगा,जिसमें शिया समुदाय के हजारों लोग शामिल होंगे। इससे पहले देर रात तक छोटा और बड़ा इमामबाड़ा में लोगों का जमावड़ा लगा रहा।मुस्लिम समुदाय ने छोटा इमामबाड़ा से बड़ा इमामबाड़ा तक कई बार रैली निकाली और अमेरिका-इजरायल का पुतला फूंका।इतना ही नहीं तमाम मुस्लिम नेता भी पहुंचकर शोकसभा में शिरकत किए।

लखनऊ के छोटा और बड़ा इमामबाड़ा पर्यटकों के लिए तीन मार्च तक बंद रहेंगे। रविवार सुबह से ही दुकानें और सड़क किनारे के स्टॉल बंद रहे,व्यापारियों ने अपनी मर्ज़ी से अपने काम बंद कर दिए और पुराने लखनऊ के इलाके में बड़ी संख्या में लोग सड़क पर है।यही नहीं शिया और सुन्नी समुदाय के तमाम उलेमाओं ने खामेनेई के मौत पर अपना शोक जाहिर करते हुए अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपनी नाराजगी का इजहार किया।

खामेनेई की मौत का सबसे ज्यादा असर उत्तर प्रदेश और लखनऊ में ही क्यों दिखाई दे रहा है।इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अयातुल्ला अली खामेनेई ईरान के सर्वोच्च नेता थे
साथ ही दुनियाभर के शिया समुदाय के धार्मिक नेता भी थे। शिया समुदाय के लोग खामेनेई को अपना आध्यात्मिक गुरु मानते थे।

भारत में शिया समुदाय की सबसे बड़ी आबादी उत्तर प्रदेश में है।यूपी में लगभग एक करोड़ से ज्यादा शिया आबादी है,इसमें लखनऊ में सबसे ज्यादा हैं।इसके बाद जौनपुर,प्रयागराज, मुजफ्फरनगर,रायबरेली,आजमगढ़,बाराबंकी,अमेठी, अमरोहा,मेरठ और कानपुर में बड़ी संख्या में शिया समुदाय के लोग रहते हैं।यही वजह है कि खामेनेई की हत्या पर सबसे ज्यादा विरोध प्रदर्शन भी यूपी के शहरों में हो रहा है। हालांकि खामेनेई की हत्या पर होने प्रदर्शन में बड़ी संख्या में सुन्नी समुदाय के लोग भी विरोध में शामिल हैं।

देश में सबसे ज्यादा शिया समुदाय के लोग लखनऊ में रहते हैं।मुहर्रम के महीने में लखनऊ का माहौल पूरी तरह से ईरान जैसा हो जाता है,ऐसे में मशहूर शायर मुनव्वर राना ने लिखा था,मुहर्रम में हमारा लखनऊ ईरान लगता था,मदद मौला! हुसैनाबाद रोता छोड़ आए हैं।

लखनऊ को शिराज-ए-हिंद कहा जाता है,क्योंकि यहां की तहजीब,शायरीऔर नफासत (नजाकत) में ईरान के शिराज शहर की झलक मिलती है।लखनऊ के इमामबाड़ों की वास्तुकला में ईरान की झलक दिखाई देती है।लखनऊ के पहले नवाब बुरहान-उल-मुल्क नवाब सादत खान ईरान (निशापुर) से आए थे।

नवाबों के साथ ही ईरान की तहजीब भाषा (फारसी) पोशाक और कला लखनऊ में आई।लखनऊ की वास्तुकला में ईरानी शैली की झलक भी दिखती है।लखनऊ का लजीज खाना जैसे कबाब और बिरयानीमें ईरानी मसालों और पकाने के तरीकों का प्रभाव देखने को मिलता है।लखनऊ में शिया मुसलमानों का बड़ा प्रभाव है।

मुहर्रम की अजादारी सीधे तौर पर ईरान की शिया परंपराओं से प्रेरित है लखनऊ सहित यूपी के तमाम शहरों के बच्चे ईरान में पढ़ाई करने भी जाते हैं।ईरान के साथ अपने मज़बूत धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्तों के लिए भी लखनऊ मशहूर है,क्योंकि उनके साथ आध्यात्मिक रिश्ता भी है।ईरान के साथ लखनऊ का कनेक्शन सिर्फ़ ट्रेड या एजुकेशन का नहीं है, बल्कि आस्था और धार्मिक गाइडेंस का भी है।ऐसे में लखनऊ में बड़ी संख्या में भी लोग खामेनेई की हत्या पर काले कपड़े पहनकर शोक जाहिर कर रहे हैं।

आठवें इमाम,इमाम अली रजा की बहन मासूमा-ए-कुम की मजार पवित्र शहर कोम में है।इसे सबसे महत्वपूर्ण शिया तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है।हर साल हजारों शिया मुसलमान फातिमा मासूमेह का सम्मान करने के लिए कोम की यात्रा करते हैं।ईरान के मशहद में इमाम रज़ा की दरगाह दुनिया की सबसे बड़ी मस्जिद परिसरों में से एक है।भारत समेत दुनिया भर से करीब तीन करोड़ लोग हर साल उनकी कब्र पर आते हैं।यही भारतीय शिया समुदाय का ईरान से रिश्ते का सबसे मुख्य कारण है।

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