नई दिल्ली।देश में सिस्टमेटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी)के जरिए निवेश का दायरा लगातार बढ़ रहा है। अगस्त 2026 में एसआईपी निवेश रिकॉर्ड 32,297 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जबकि कुल एसआईपी एयूएम 18.62 लाख करोड़ रुपये हो गया है। इस बढ़ोतरी के बीच उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ समेत दूसरे हिंदी भाषी राज्यों में म्युचुअल फंड का बढ़ता आधार भी ध्यान खींच रहा है।
एएमएफआई के आंकड़े बताते हैं कि इनमें से कई राज्यों में कुल म्युचुअल फंड एयूएम में एसआईपी की हिस्सेदारी अच्छी-खासी है। साथ ही छोटे शहरों में निवेशक पहले के मुकाबले ज्यादा लंबे समय तक एसआईपी से जुड़े रह रहे हैं। ऐसे में सवाल है कि हिंदी भाषी राज्यों में एसआईपी की मौजूदा तस्वीर कैसी है,क्या यहां से म्युचुअल फंड उद्योग को अगली बड़ी ग्रोथ मिल सकती है और क्या हिंदी में निवेश से जुड़ी जानकारी की कमी अब भी नए निवेशकों के लिए बड़ी रुकावट है।
हिंदी भाषी राज्यों में एसआईपी की तस्वीर कैसी है
एएमएफआई-क्रिसिल फैक्टबुक के मुताबिक कई हिंदी भाषी राज्यों में कुल म्युचुअल फंड एयूएम में एसआईपी की हिस्सेदारी मजबूत है।हिमाचल प्रदेश में यह हिस्सेदारी करीब 46 फीसदी है। चंडीगढ़ में यह करीब 42 फीसदी है। बिहार, उत्तराखंड और जम्मू-कश्मीर में भी एसआईपी एयूएम की हिस्सेदारी करीब 37 से 39 फीसदी के दायरे में है।
राजस्थान, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी कुल म्युचुअल फंड एयूएम में एसआईपी की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई या उससे ज्यादा दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में यह हिस्सेदारी इन राज्यों से कुछ कम है, लेकिन देश के सबसे अधिक आबादी वाले राज्य होने के कारण यहां निवेशकों का बड़ा संभावित आधार मौजूद है। ये आंकड़े बताते हैं कि एसआईपी की पहुंच केवल देश के बड़े वित्तीय केंद्रों तक सीमित नहीं है।एविसा वेल्थ क्रिएटर्स के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर आदित्य अग्रवाल के मुताबिक उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान समेत हिंदी भाषी क्षेत्र में एसआईपी का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। डिजिटल तरीके से खाता खोलने की सुविधा और यूपीआई के बढ़ते इस्तेमाल से टियर-2 और टियर-3 शहरों से निवेशकों की भागीदारी बढ़ी है।
छोटे शहरों में लंबे समय तक टिक रहे एसआईपी निवेशक
एसआईपी की बढ़ती पहुंच के साथ एक और अहम बदलाव निवेश की अवधि में दिखाई देता है। एम्फी-क्रिसिल इंटेलिजेंस के आंकड़ों के मुताबिक मार्च 2020 में B30 शहरों में एसआईपी एयूएम का केवल 11 फीसदी हिस्सा पांच साल से ज्यादा समय से निवेश में बना हुआ था। मार्च 2025 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 29 फीसदी हो गई।इसके उलट एक साल से कम अवधि वाले एसआईपी एयूएम की हिस्सेदारी B30 शहरों में मार्च 2020 के 41 फीसदी से घटकर मार्च 2025 में 23 फीसदी रह गई। यानी छोटे शहरों में एसआईपी का इस्तेमाल बढ़ने के साथ निवेश का एक बड़ा हिस्सा लंबे समय तक बना हुआ भी दिखाई देता है।दिलचस्प बात यह है कि इस मामले में B30 और देश के टॉप-30 यानी T30 शहरों की तस्वीर बहुत अलग नहीं है। मार्च 2025 में T30 शहरों में पांच साल से ज्यादा पुराने एसआईपी एयूएम की हिस्सेदारी 30 फीसदी थी, जबकि B30 शहरों में यह 29 फीसदी थी।एएमएफआई की FY25 रिपोर्ट भी कहती है कि पांच साल से ज्यादा समय तक रखे गए एसआईपी एसेट की हिस्सेदारी मार्च 2020 के मुकाबले मार्च 2025 में काफी बढ़ी है, जो लंबे समय के निवेश की तरफ बदलाव का संकेत देती है।
क्या हिंदी भाषी राज्य बन सकते हैं अगला ग्रोथ इंजन
भारत में एसआईपी का कुल आकार जिस तेजी से बढ़ा है, उससे म्युचुअल फंड उद्योग के लिए नए निवेशकों की अहमियत भी बढ़ी है। अगस्त 2025 में मासिक एसआईपी निवेश 28,265 करोड़ रुपये था, जो अगस्त 2026 में बढ़कर 32,297 करोड़ रुपये हो गया। इसी अवधि में एसआईपी एयूएम 18.62 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अगस्त 2026 में करीब 10.02 करोड़ एसआईपी खाते ऐसे थे जिनसे निवेश आ रहा था।मास्टर कैपिटल सर्विसेज लिमिटेड की असिस्टेंट वाइस प्रेसिडेंट, वेल्थ मैनेजमेंट आकांक्षा शुक्ला के मुताबिक हिंदी भाषी क्षेत्रों में एसआईपी की पहुंच अब छोटी कहानी नहीं रह गई है। वह एएमएफआई के FY26 आंकड़ों का हवाला देते हुए कहती हैं कि हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों में एसआईपी की मजबूत हिस्सेदारी और B30 शहरों में बढ़ता एएमयू इस क्षेत्र की बढ़ती अहमियत दिखाता है।वहीं आदित्य अग्रवाल का मानना है कि हिंदी भाषी राज्यों से बढ़ती भागीदारी देश के मासिक एसआईपी निवेश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। खास तौर पर टियर-2 और टियर-3 शहरों से नए निवेशकों का जुड़ना इस ग्रोथ को आगे ले जा सकता है।
क्या हिंदी में वित्तीय जानकारी की कमी अब भी रुकावट है
हिंदी भाषी राज्यों में एसआईपी का दायरा बढ़ाने में केवल निवेश की सुविधा ही नहीं, बल्कि निवेशकों तक उनकी भाषा में सही जानकारी पहुंचना भी अहम है।आदित्य अग्रवाल के मुताबिक हिंदी में वित्तीय जानकारी की कमी अब पहले जैसी बड़ी रुकावट नहीं है। हिंदी और दूसरी स्थानीय भाषाओं में वित्तीय जानकारी देने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। स्थानीय सलाहकारों का नेटवर्क मजबूत हुआ है और कई निवेश ऐप अलग-अलग भाषाओं में सेवाएं दे रहे हैं। इससे जानकारी की कमी कम हुई है।हालांकि आकांक्षा शुक्ला का मानना है कि यह अंतर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। उनके मुताबिक स्थानीय भाषाओं में वित्तीय सामग्री बढ़ी है, लेकिन हिंदी में म्युचुअल फंड वितरण और जानकारी की पहुंच अब भी अंग्रेजी को प्राथमिकता देने वाले प्लेटफॉर्म से पीछे है। इस अंतर को कम करना आगे की ग्रोथ के लिए अहम होगा।
हिंदी भाषी राज्यों में आगे कितनी गुंजाइश
म्युचुअल फंड उद्योग का कुल एएमयू अगस्त 2026 के अंत में 87.08 लाख करोड़ रुपये पहुंच चुका है। पांच साल पहले अगस्त 2021 में यह 36.59 लाख करोड़ रुपये था। इसी अवधि में कुल फोलियो की संख्या 10.86 करोड़ से बढ़कर 28.35 करोड़ हो गई है।एएमएफआई के मुताबिक म्युचुअल फंड डिस्ट्रीब्यूटर खास तौर पर छोटे शहरों में निवेशकों तक पहुंच बनाने और बाजार में उतार-चढ़ाव के दौरान उन्हें निवेश बनाए रखने में भूमिका निभा रहे हैं।जानकार बताते हैं कि हिंदी भाषी राज्यों में आगे की ग्रोथ इस बात पर भी निर्भर करेगी कि नए निवेशक कितनी तेजी से जुड़ते हैं और जुड़ने के बाद कितने लंबे समय तक एसआईपी जारी रखते हैं। राज्यवार एसआईपी एयूएम और B30 शहरों में बढ़ती निवेश अवधि के आंकड़े बताते हैं कि इन बाजारों में एसआईपी की मौजूदगी पहले ही बन चुकी है। आगे डिजिटल पहुंच, स्थानीय वितरण नेटवर्क और हिंदी में आसान व भरोसेमंद वित्तीय जानकारी इस दायरे को और बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकती है।