होर्मुज क्राइसिस में उजागर हुई विश्व की कमजोरी,और भयावह होगा अगला झटका
होर्मुज क्राइसिस में उजागर हुई विश्व की कमजोरी,और भयावह होगा अगला झटका

21 Sep 2026 |   25



 

नई दिल्ली।विश्व की एनर्जी सप्लाई का रास्ता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज है।होर्मुज से रोज लगभग 2.1 करोड़ बैरल तेल गुजरता है।इस रास्ते पर अगर संकट खड़ा हो जाए तो असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता,बल्कि विश्व की अर्थव्यवस्था और उद्योगों तक पहुंचता है।होर्मुज संकट इसी खतरे की बड़ी तस्वीर दिखाता है।

होर्मुज पर आया संकट सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहा

होर्मुज पर आया संकट सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं रहा,बल्कि इसने विश्व की ऊर्जा सप्लाई की कमजोर कड़ियों को भी सामने ला दिया है।बाजार ने कम खपत,वैकल्पिक रूट और इन्वेंट्री के सहारे झटका संभाला,लेकिन इसकी भी सीमाएं सामने आईं।भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक के लिए यह संकट सप्लाई डाइवर्सिफिकेशन और स्ट्रेटेजिक रिजर्व की अहमियत बढ़ाता है।

एमजीआई के मुताबिक...

मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट (एमजीआई) के मुताबिक संकट के चरम पर विश्व की लगभग 14 फीसदी तेल और गैस सप्लाई प्रभावित हुई। यह असर 1970 के दशक के बड़े तेल झटकों से दोगुने से भी ज्यादा और 2022 के रूस-यूक्रेन व्यवधान से करीब छह गुना बड़ा था।

होर्मुज महत्वपूर्ण क्यों

होर्मुज की अहमियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2025 की चौथी तिमाही में होर्मुज से हर दिन लगभग 21 मिलियन बैरल तेल गुजरा,जिसमें लगभग 16 मिलियन बैरल क्रूड और 5 मिलियन बैरल रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद शामिल थे।यानी यह सिर्फ एक समुद्री रास्ता नहीं, बल्कि विश्व के ऊर्जा कारोबार की प्रमुख कड़ी है।होर्मुज में आने वाला कोई भी बड़ा व्यवधान तेल,गैस, पेट्रोलियम उत्पादों और इनसे जुड़े कारोबार पर एक साथ दबाव डाल सकता है।फिर भी संकट के दौरान वैश्विक बाजार पूरी तरह ठप नहीं हुआ।बाजार ने कम खपत,वैकल्पिक रास्तों,पहले से मौजूद भंडार और बदले हुए ट्रेड फ्लो के सहारे सप्लाई के झटके को कुछ हद तक संभाला।

खपत घटाकर संभाली गई बड़ी कमी

मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट के अनुमान के मुताबिक संकट के दौरान जितनी तेल सप्लाई बाजार से बाहर हुई,उसका करीब 45 फीसदी हिस्सा कम खपत के जरिए संभाला गया,यह करीब 6.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन के बराबर था।चीन ने अपने तेल आयात में कमी की,जबकि अमेरिका ने एक्सपोर्ट बढ़ाया,इससे विश्व के अलग-अलग हिस्सों में तेल की सप्लाई का प्रवाह बदला और बाजार को कुछ राहत मिली, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक और अहम बात साफ कर दी कि ऊर्जा बाजार के पास मौजूद बफर असीमित नहीं है।

इन्वेंट्री और वैकल्पिक रास्तों की भी सीमा

सप्लाई संकट के दौरान कीमतों में तेजी आई,तेल के भंडार घटे और रिफाइनरी सिस्टम पर दबाव बढ़ा।वैकल्पिक इंफ्रास्ट्रक्चर ने कुछ राहत जरूर दी,लेकिन वह पूरी कमी को आसानी से पूरा नहीं कर सका.।सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन में आया व्यवधान इसका उदाहरण है।यह पाइपलाइन होर्मुज को बायपास करने वाले प्रमुख विकल्पों में शामिल है,लेकिन इसमें परेशानी आने से यह साफ हुआ कि वैकल्पिक रास्ते भी पूरी तरह जोखिम से बाहर नहीं हैं।यानी सिर्फ एक पाइपलाइन या दूसरा शिपिंग रूट तैयार कर देना ऊर्जा सुरक्षा की गारंटी नहीं है।संकट के समय उसकी क्षमता, लोकेशन और दूसरे इंफ्रास्ट्रक्चर से कनेक्टिविटी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

विश्व के कई बड़े चोकपॉइंट खतरे में

एमजीआई के मुताबिक वैश्विक ऊर्जा कारोबार का करीब दो-तिहाई हिस्सा समुद्री चोकपॉइंट्स से होकर गुजरता है।यही वजह है कि किसी एक महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते पर संकट का असर विश्व के कई हिस्सों में एक साथ दिखाई दे सकता है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का से हर दिन करीब 23 मिलियन बैरल तेल और रिफाइंड उत्पाद गुजरते हैं,इसके बाद होर्मुज भी करीब 21 मिलियन बैरल प्रतिदिन के प्रवाह के साथ बेहद अहम है।
इसके अलावा केप ऑफ गुड होप,सुएज कैनाल,टर्किश स्ट्रेट्स,बाब अल-मंदेब और पनामा कैनाल भी वैश्विक ऊर्जा कारोबार के लिए महत्वपूर्ण रास्ते हैं। रेड सी और यमन में हालिया तनाव ने भी दिखाया है कि जब किसी समुद्री रूट पर खतरा बढ़ता है तो जहाजों को लंबा रास्ता अपनाना पड़ सकता है, इससे यात्रा का समय और परिवहन लागत दोनों बढ़ते हैं।

भारत के लिए क्या मायने रखता है होर्मुज 

भारत विश्व के बड़े ऊर्जा आयातक देशों में शामिल है,ऐसे में होर्मुज जैसे किसी अहम रूट पर संकट का सीधा असर भारतीय ऊर्जा सुरक्षा पर पड़ सकता है।भारत के लिए क्रूड सप्लाई में विविधता,रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व,वैकल्पिक शिपिंग रूट,घरेलू रिफाइनिंग क्षमता और जरूरत पड़ने पर एक ईंधन की जगह दूसरे ईंधन का इस्तेमाल करने की क्षमता का महत्व बढ़ गया है। विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्थाएं भी अब बायपास पाइपलाइन, वैकल्पिक तेल और गैस सप्लाई, इलेक्ट्रिफिकेशन और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने पर निवेश बढ़ा रही हैं।

जानें क्या है एमजीआई का अनुमान 

एमजीआई का अनुमान है कि इन उपायों के जरिए 2030 तक किसी नए बड़े व्यवधान की स्थिति में होर्मुज से पहले आने वाले तेल प्रवाह का करीब 35 फीसदी से 70 फीसदी तक कवर किया जा सकता है।यह करीब 7 से 15 मिलियन बैरल प्रतिदिन या वैश्विक तेल सप्लाई के करीब 7 फीसदी से 15 फीसदी के बराबर है।हालांकि यहां भी चुनौती कम नहीं है।पाइपलाइन कुछ तय जगहों को जोड़ती हैं और संकट आने पर उन्हें आसानी से किसी दूसरे रूट की तरफ मोड़ा नहीं जा सकता।दूसरी ओर बैकअप इंफ्रास्ट्रक्चर सामान्य समय में कम इस्तेमाल हो सकता है, लेकिन संकट के वक्त उसकी जरूरत अचानक बहुत बढ़ जाती है।

भारत और चीन की एक और मजबूरी

एमजीआई के मुताबिक भारत और चीन कोयले की उपलब्धता के जरिए तेल और गैस सप्लाई में आए कुछ झटकों को संभाल सकते हैं।जरूरत पड़ने पर दोनों देश दूसरे ईंधनों की तरफ कुछ हद तक रुख कर सकते हैं,लेकिन समस्या यह है कि दोनों देशों की करीब 84 फीसदी ऊर्जा ट्रेड समुद्री चोकपॉइंट्स से होकर गुजरती है।इसका मतलब यह है कि वैकल्पिक ईंधन उपलब्ध होने के बावजूद समुद्री रास्तों पर निर्भरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है,इसलिए ऊर्जा सुरक्षा का सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किसी देश के पास कितना तेल या गैस है,बल्कि यह भी है कि वह सप्लाई वहां तक कितनी सुरक्षित तरीके से पहुंच सकती है।

एलएनजी की कीमतों ने भी बढ़ाई चिंता

होर्मुज संकट का असर सिर्फ क्रूड मार्केट तक सीमित नहीं रहा।एल‌एनजी बाजार में भी दबाव देखने को मिला।एशियाई स्पॉट एल‌एनजी कीमतें युद्ध से पहले करीब 10 डॉलर प्रति मिलियन ब्रिटिश थर्मल यूनिट थीं,जो बढ़कर लगभग 30 डॉलर तक पहुंच गईं।गैस की कीमत बढ़ने पर भारत समेत कई एशियाई खरीदारों ने कोयले और तेल की ओर रुख किया। इससे पता चलता है कि ऊर्जा बाजार में एक ईंधन की सप्लाई प्रभावित होने पर उसका असर दूसरे ईंधनों की मांग और कीमतों पर भी पड़ सकता है।

More news