नई दिल्ली।सुनकर आप बड़े अचंभित होंगे।मगर फैशन और इकॉनमी लगभग एक सदी से एक अनोखी थ्योरी से जुड़े हैं। अर्थव्यवस्था की सेहत से स्कर्ट की लंबाई का कनेक्शन जोड़कर देखा गया है। इसे हेमलाइन इंडेक्स कहा जाता है। इस थ्योरी के अनुसार मुताबिक अर्थव्यवस्था के मुश्किल में होने पर स्कर्ट की लंबाई बढ़ती है।वहीं अच्छी स्थिति में स्कर्ट की लंबाई घट जाती है।
माना जाता है कि मजबूत इकॉनमी से आत्मविश्वास बढ़ता है
माना जाता है कि मजबूत इकॉनमी से आत्मविश्वास बढ़ता है, ज्यादा खर्च होता है,नए प्रयोग करने की इच्छा भी बढ़ती है। जब समय मुश्किल होता है तो सावधानी बरती जाती है। फैशन भी वैसा ही हो जाता है। स्कर्ट लंबी और ज्यादा पारंपरिक हो जाती हैं। जब इकॉनमी तेजी पर होती है तो हेमलाइन ऊपर जाती है। इसमें गिरावट आती है तो यह नीचे आ जाती है।
इतिहास में मिलते हैं उदाहरण
फैशन के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं,जो इस बात पर सही बैठते हैं। 1950 के दशक में इकॉनमी के विस्तार के साथ हेमलाइन भी ऊपर गई। 1960 के दशक की तेजी के साथ मिनी-स्कर्ट मुख्यधारा में आ गई। जब उस दशक के आखिर में आर्थिक मुश्किलें शुरू हुईं तो जमीन तक लंबी हिप्पी स्कर्ट लोकप्रिय हो गईं।यह पैटर्न 1970 के दशक में फिर से दिखाई दिया। 1973 में अरब देशों की ओर से तेल की बिक्री पर रोक और बढ़ती महंगाई के साथ शेयर बाजार में गिरावट आई। लंबी मैक्सी स्कर्ट लोकप्रिय हुईं। हाल ही में 2006 के आसपास छोटी बेबी-डॉल ड्रेस का चलन था। तब अमेरिकी हाउसिंग मार्केट अपने चरम पर था। 2007 में जब बाजार गिरा तो लंबी, ढीली-ढाली ड्रेस फिर से चलन में आ गईं।अगर हेमलाइन की तुलना बड़े आर्थिक चक्रों से की जाए तो यह थ्योरी आश्चर्यजनक रूप से सही लग सकती है,लेकिन सिर्फ एक पैटर्न का दिखना ही भविष्य बताने के लिए काफी नहीं है।
जब फैशन और इकॉनमी का हुआ मिलन
यह थ्योरी 1926 में व्हार्टन बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर और अर्थशास्त्री जॉर्ज टेलर ने दी थी।जाॅर्ज टेलर ने तर्क दिया था कि महिलाओं की ड्रेस की लंबाई इकनॉमिक साइकिल के साथ बदलती है।यह सही समय था-रोरिंग ट्वेंटीज (1920 का दशक) में फ्लैपर ड्रेस के कारण घुटने तक की लंबाई वाली स्कर्ट मुख्यधारा में आ गई थीं। शेयर बाजार के क्रैश होने और महामंदी की शुरुआत के बाद स्कर्ट की लंबाई तेजी से बढ़ी और लंबी,ज्यादा पारंपरिक स्टाइल वाली ड्रेस फिर से चलन में आ गईं।इसके कई कारण बताए गए हैं। एक कारण यह है कि खुशहाली के दौर में महिलाएं सिल्क स्टॉकिंग्स खरीद सकती थीं। उन्हें दिखाने के लिए छोटी स्कर्ट पहनना पसंद करती थीं। मुश्किल समय में वे उन्हें नहीं खरीद पाती थीं। लंबी स्कर्ट से अपने पैरों को ढंक लेती थीं। एक और कारण यह है कि खुशहाली से ग्राहकों और डिजाइनरों को प्रयोग करने की ज्यादा आजादी मिलती है। बाद में इस पैटर्न को दूसरे साइकल से जोड़ा गया।युद्ध के बाद की तेजी और 1960 के दशक में मिनीस्कर्ट का चलन बढ़ा। जबकि तेल संकट के बाद लंबी स्मोक ड्रेस और ट्यूनिक का चलन शुरू हुआ। 1980 के दशक में तथाकथित मिलियनेयर बूम के साथ छोटी हेमलाइन का दौर फिर से आया। इन घटनाओं ने हेमलाइन इंडेक्स को एक लोकप्रिय थ्योरी के तौर पर स्थापित करने में मदद की। हालांकि बार-बार दिखने वाला पैटर्न जरूरी नहीं कि आर्थिक संबंध का सबूत ही हो।
हेमलाइन का टेस्ट
अगर रिसर्चर ने इसकी जांच करने की कोशिश न की होती तो हेमलाइन इंडेक्स शायद फैशन की दुनिया की एक सुनी-सुनाई कहानी (अर्बन लेजेंड) बनकर रह जाता।इरास्मस स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के इकोनोमेट्रिक इंस्टीट्यूट के मार्जोलीन वैन बार्डविज्क और फिलिप हंस फ्रांसिस की 2010 की एक स्टडी में ठीक यही किया गया। फैशन के कुछ मशहूर पलों पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने 1921 से 2009 तक का मासिक हेमलाइन डेटा इकट्ठा किया। NBER के इकोनॉमिक साइकिल के कालक्रम से उसकी तुलना की।उन्होंने ड्रेस की लंबाई की पांच कैटेगरी का इस्तेमाल किया- मिनी, बैलेरीना लेंथ, घुटने के नीचे, पूरी लंबाई या टखने तक और फर्श तक लंबी।हालांकि, उनके नतीजों ने इस थ्योरी को पूरी तरह से गलत साबित नहीं किया। लेकिन, संबंध वैसा नहीं था जैसा आप सोच सकते हैं। ऐसा लगा कि अर्थव्यवस्था हेमलाइन से लगभग तीन साल आगे चलती है। इसलिए आर्थिक हालात में बदलाव स्कर्ट की लंबाई में तुरंत नहीं दिखता था।यह देरी समझ में आती है। एक डिजाइनर कलेक्शन बनाता है, वह रनवे पर दिखता है, खरीदार उसका ऑर्डर देते हैं, मैन्युफैक्चरर उसे बनाते हैं और आखिरकार वह दुकानों तक पहुंचता है। स्टडी में यह भी बताया गया कि फैशन को रेडी-टू-वियर बनने से एक या उससे ज्यादा साल पहले डिजाइन किया जा सकता है।
आज की स्कर्ट कल की अर्थव्यवस्था पर प्रतिक्रिया
रिसर्चर इस नतीजे पर पहुंचे कि खुशहाली का संबंध छोटी हेमलाइन से और खराब आर्थिक हालात का संबंध लंबी ड्रेस से था। इसमें लगभग तीन साल का अंतर था। उन्हें ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि हेमलाइन खुद आर्थिक चक्र को प्रभावित करती हैं। मिनीस्कर्ट पहनने वाली महिला की वजह से शेयर बाजार ऊपर नहीं जाता।
लेकिन फैशन की होती है अपनी मर्जी
इस थ्योरी की आलोचना यह कहकर की गई है कि यह बहुत सरल है। फैशन कई वजहों से बदलता है। स्कर्ट की लंबाई GDP, शेयर की कीमतों या मंदी की तारीखों से शायद ही नियंत्रित होती है। PwC इंडिया में इकोनॉमिक एडवाइजरी के पार्टनर और लीडर रानेन बनर्जी इसे बहुत अच्छी तरह से स्थापित इंडेक्स नहीं मानते हैं। हो सकता है कि पश्चिमी देशों में इसका संबंध आर्थिक प्रदर्शन से केवल कुछ ही समय के लिए रहा हो।हालांकि, इसका एक संभावित बिहेवियरल एक्सप्लेनेशन हो सकता है।
बनर्जी ने TOI को ये बताया
बनर्जी ने TOI को बताया कि इसके पीछे की साइकोलॉजी, हालांकि अभी तक पता नहीं चली है। यह हो सकती है कि लोग ज्यादा कॉन्फिडेंट होंगे और शॉपिंग, डाइनिंग और दूसरी फुरसत की एक्टिविटीज के लिए बाहर जाएंगे, जहां वे ज्यादा फैशनेबल दिखना चाहेंगे और इसलिए हेमलाइन छोटी रखेंगे, जबकि जब इकॉनमिक टाइम अच्छा नहीं होगा तो वे ज्यादा घर के अंदर रहेंगे और इसलिए लंबी स्कर्ट पहन सकते हैं।इससे यह थ्योरी स्कर्ट की लंबाई के बारे में कम और कंज्यूमर कॉन्फिडेंस और अपनी मर्जी से खर्च करने के बारे में ज्यादा हो जाती है।
ग्रांट थॉर्नटन भारत में एसोसिएट पार्टनर डॉ. गौरव एस घोष किस चीज की ओर इशारा करते हैं
ग्रांट थॉर्नटन भारत में एसोसिएट पार्टनर डॉ. गौरव एस घोष उस चीज की ओर इशारा करते हैं,जिसे इकॉनमिस्ट कभी-कभी ब्रॉडर सोशियल सेंटीमेंट या एनिमल स्पिरिट्स कहते हैं। जब लोग ऑप्टिमिस्टिक और कॉन्फिडेंट महसूस करते हैं तब फैशन ज्यादा एक्सप्रेसिव हो सकता है। छोटी हेमलाइन इसका एक उदाहरण हो सकती है।एक और एक्सप्लेनेशन सोशल लिबरलाइजेशन है। कारण है कि अमीर समाज ज्यादा सोशली लिबरल हो सकते हैं और यह कपड़ों में दिख सकता है,लेकिन घोष का कहना है कि ये एक्सप्लेनेशन जांच करने पर गलत साबित हो सकते हैं।सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि फैशन साइकिल और बिजनेस साइकिल जरूरी नहीं कि एक ही चीज हों। एक स्कर्ट छोटी हो सकती है क्योंकि डिजाइनर छोटी स्कर्ट को फैशनेबल मानते हैं। एक लंबी ड्रेस वापस आ सकती है क्योंकि कस्टमर इसे पसंद करते हैं। दोनों में से किसी के लिए भी मंदी या तेजी की जरूरत नहीं है। इंडेक्स को मापना भी मुश्किल है।जैसा कि घोष कहते हैं, हेमलाइन फैशन साइकिल में ऊपर-नीचे होती रहती हैं, जो बिजनेस साइकिल से जुड़ी हो भी सकती हैं और नहीं भी। मापना मुश्किल है।