वंदे भारत और शताब्दी एक्सप्रेस के सफर में कितना है दम,सीट,फेयर, स्पीड और फैसिलिटी का जानें कम्पेरिजन
वंदे भारत और शताब्दी एक्सप्रेस के सफर में कितना है दम,सीट,फेयर, स्पीड और फैसिलिटी का जानें कम्पेरिजन

24 Sep 2026 |   25



 

धनंजय सिंह।एक दौर था जब शताब्दी एक्सप्रेस ट्रेन यात्रा में आधुनिकता और रफ्तार की पहचान मानी जाती थी।आज के दौर में रेलवे के पास वंदे भारत जैसी नई ट्रेनें हैं,ऐसे में दोनों ट्रेनों को सीधे इस आधार पर तुलना करना कि कौन ज्यादा आधुनिक है,शायद सही तरीका नहीं होगा।

शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत अपने-अपने दौर की तकनीक का प्रतिनिधित्व करती हैं,लेकिन यात्रियों के लिए सवाल आज भी वही है। शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत में कितनी देर का सफर होगा,कितना किराया लगेगा और क्या-क्या सुविधाएं मिलेंगी।

नई दिल्ली-चंडीगढ़ की दूरी लगभग 266 किलोमीटर है।वंदे भारत को लगभग 2 घंटे 48 मिनट लगता है,वहीं शताब्दी एक्सप्रेस को लगभग 3 घंटे 19 मिनट लगते हैं। शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत के बीच यात्रा समय का फर्क लगभग 31 मिनट का है,लेकिन चेयर कार की बात करें तो किराया लगभग बराबर है।

वंदे भारत में चेयर कार का किराया लगभग 714 रुपए और शताब्दी एक्सप्रेस में 715 रुपए से शुरू होता है।सिर्फ 1रुप‌ए के अंतर में यात्री के सामने दो अलग तकनीकी पीढ़ियों की ट्रेनें हैं।हालांकि किराया ट्रेन,यात्रा की तारीख और लागू शुल्क के हिसाब से बदल सकता है।अंतिम किराया बुकिंग के समय रेलवे की टिकट बुकिंग सिस्टम पर देखना चाहिए।

वंदे भारत को पारंपरिक इंजन और कोच वाली ट्रेन की तरह डिजाइन नहीं किया गया है।वंदे भारत सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है,इसमें अलग लोकोमोटिव ट्रेन को खींचने के बजाय ट्रेन के कोच में ही पावर जनरेशन सिस्टम दिया गया है।इसी डिजाइन से इसमें तेजी से गति पकड़ने की क्षमता है।भारतीय रेलवे के मुताबिक वंदे भारत की अधिकतम डिजाइन स्पीड 160 किलोमीटर प्रति घंटा है।

नई सीरीज की वंदे भारत ट्रेनों की टॉप डिजाइन स्पीड 180 किलोमीटर है।इनमें ऑटोमैटिक दरवाजे,जीपीएस बेस्ड पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम,बायो-वैक्यूम टॉयलेट और ऑनबोर्ड इन्फोटेनमेंट जैसी सुविधाएं दी गई हैं।हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर रूट पर ट्रेन 160 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलेगी।वास्तविक स्पीड ट्रैक,सिग्नलिंग,रूट और दूसरे कारणों पर निर्भर करती है।

शताब्दी को वंदे भारत के मुकाबले सिर्फ पुरानी ट्रेन नहीं कहा जा सकता है।जब 1988 में शताब्दी एक्सप्रेस शुरू हुई थी, तब यह कम दूरी के तेज एसी सफर के लिए रेलवे का एक नया प्रयोग था,इसमें चेयर कार और एग्जीक्यूटिव क्लास के साथ भोजन की सुविधा भी दी गई थी।

आज कई शताब्दी ट्रेनों में एलएचबी कोच इस्तेमाल होते हैं, इसलिए मौजूदा शताब्दी को उसके शुरुआती दौर के कोचों से अलग समझना चाहिए,इसलिए वंदे भारत और शताब्दी की तुलना उनके इतिहास से नहीं,बल्कि आज यात्री को मिलने वाली सुविधाओं के आधार पर करना ज्यादा उपयोगी है।

वंदे भारत की डिजाइन स्पीड 160 किलोमीटर प्रति घंटा है। शताब्दी की कई रूट पर टॉप स्पीड लगभग 130 किलोमीटर प्रति घंटा तक है,लेकिन ट्रेन की अधिकतम स्पीड ही पूरे सफर का समय तय नहीं करती,इसमें स्टॉपेज,ट्रैक की स्थिति, सिग्नलिंग और दूसरे ट्रैफिक का भी असर होता है।नई दिल्ली-चंडीगढ़ रूट पर इसका फर्क साफ दिखता है,वंदे भारत के कम स्टॉपेज हैं,जबकि शताब्दी ज्यादा स्टेशनों पर रुकती है,इसलिए इस रूट पर वंदे भारत का कुल यात्रा समय कम है।

शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत में एसी चेयर कार और एग्जीक्यूटिव चेयर कार मिलती है।चेयर कार सामान्य बैठने वाली क्लास है।वहीं एग्जीक्यूटिव क्लास में ज्यादा जगह और बेहतर सीटिंग मिलती है।वंदे भारत में रिक्लाइनिंग सीट,हर सीट के लिए चार्जिंग प्वाइंट और रीडिंग लाइट जैसी सुविधाएं हैं।एग्जीक्यूटिव क्लास के कुछ कॉन्फिगरेशन में सीटों को 180 डिग्री या 360 डिग्री तक घुमाने की सुविधा भी मिलती है।शताब्दी में भी आरामदायक एसी सीटिंग मिलती है,इसके अलावा कुछ चुनिंदा रूट पर विस्टाडोम कोच भी उपलब्ध हैं।

अगर यात्री का फोकस सिर्फ जल्दी अपने डेस्टिनेशन पर पहुंचने पर नहीं है,तो शताब्दी के कुछ रूट पर मिलने वाला विस्टाडोम कोच एक अलग अनुभव देता है,इस कोच में बड़े शीशे,कांच वाली छत और रोटेट होने वाली सीटें मिलती हैं। यानी सफर के दौरान बाहर का नजारा देखने का अनुभव सामान्य चेयर कार से अलग हो जाता है।यह सुविधा हर शताब्दी में नहीं होती,इसलिए टिकट बुक करते समय अपने रूट की ट्रेन और कोच संरचना देखना जरूरी है।

वंदे भारत को शुरू से ही आधुनिक ट्रेनसेट के रूप में तैयार किया गया है,इसमें ऑटोमैटिक पैसेंजर डोर,जीपीएस आधारित पैसेंजर इंफॉर्मेशन सिस्टम,सीसीटीवी,बायो-वैक्यूम टॉयलेट और ऑनबोर्ड इन्फोटेनमेंट जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इसके मुकाबले शताब्दी की मौजूदा सेवाओं में कोच और सुविधाएं ट्रेन के रूट और रेक के हिसाब से अलग हो सकती हैं,इसलिए यहां तुलना का मतलब यह नहीं कि एक ट्रेन की सुविधा है और दूसरी में नहीं,बल्कि अंतर यह है कि वंदे भारत को इन आधुनिक सुविधाओं को ध्यान में रखकर एक ट्रेनसेट के रूप में डिजाइन किया गया है।

शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत में यात्रा के समय के हिसाब से चाय,नाश्ता,खाना या शाम के स्नैक्स जैसी खानपान सेवाएं मिल सकती हैं।वंदे भारत की कुछ सेवाओं में मेन्यू के तहत फल,मफिन या ब्राउनी,ड्राई फ्रूट्स,चिक्की,कैरामेल पॉपकॉर्न और क्षेत्रीय स्नैक्स जैसी चीजें भी शामिल हो सकती हैं। शताब्दी एक्सप्रेस में भी खानपान सेवा रूट और यात्रा के समय के अनुसार होती है,कुछ रूट पर आईआरसीटीसी ई-कैटरिंग के जरिए चुनिंदा स्टेशनों से सीट पर खाना मंगाने का विकल्प भी उपलब्ध होता है।

शताब्दी एक्सप्रेस और वंदे भारत के बीच सबसे अहम अंतर उनकी बनावट का है।वंदे भारत सेल्फ-प्रोपेल्ड ट्रेनसेट है,इसमें पावर सिस्टम ट्रेन के कोच के अंदर ही दिया गया है,इससे तेज एक्सेलरेशन में मदद मिलती है और ट्रेन खुलते ही चंद सेकंड में स्पीड पकड़ लेती है।दूसरी ओर शताब्दी एक्सप्रेस लोकोमोटिव-हॉल्ड ट्रेन है।यानी इसमें एक इंजन ट्रेन के कोचों को खींचता है।

यह चुनाव किसी एक ट्रेन को बेहतर साबित करने का सवाल नहीं है,अगर आपके रूट पर वंदे भारत कम स्टॉप के साथ चल रही है, तो यात्रा समय कम हो सकता है,अगर आपको आधुनिक ट्रेनसेट,नई पीढ़ी की यात्री सुविधाएं और तेज एक्सेलरेशन पसंद है, तो ये चीजें वंदे भारत में मिलती हैं। दूसरी तरफ कुछ रूट पर शताब्दी का किराया,समय और कोच विकल्प अलग हो सकते हैं।विस्टाडोम जैसी सुविधा वाले रूट पर इसका अनुभव भी अलग है।

इसलिए टिकट बुक करने से पहले सिर्फ ट्रेन का नाम न देखें। अपने रूट पर यात्रा समय,स्टॉपेज,चेयर कार/एग्जीक्यूटिव किराया,कोच और उपलब्ध सुविधाएं जरूर देख लें,वंदे भारत और शताब्दी की असली तुलना इसी तरह की जा सकती है। एक नई पीढ़ी की ट्रेनसेट तकनीक है,जबकि दूसरी ने अपने दौर में भारतीय रेलवे के तेज और आधुनिक एसी सफर की तस्वीर बदली थी।

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