दिल्ली शराब नीति मामले में केजरीवाल और सिसोदिया को मिली बड़ी राहत,सीबीआई की याचिका पर जवाब के लिए मिला समय
दिल्ली शराब नीति मामले में केजरीवाल और सिसोदिया को मिली बड़ी राहत,सीबीआई की याचिका पर जवाब के लिए मिला समय

16 Mar 2026 |   14



 

नई दिल्ली।दिल्ली शराब नीति मामले में पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को हाई कोर्ट से सोमवार को बड़ी राहत मिली है।हाई कोर्ट ने सोमवार केजरीवाल,सिसोदिया और 21 अन्य आरोपियों को केंद्रीय जांच एजेंसी(सीबीआई)की याचिका पर जवाब देने के लिए समय दिया।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर यह निर्देश जारी किया है। सीबीआई ने निचली अदालत के उस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी है,जिसमें सभी आरोपियों को बरी कर दिया गया था।कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 6 अप्रैल के लिए तय की है।

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सीबीआई का पक्ष रखते हुए ट्रायल कोर्ट के आदेश को गलत करार दिया।मेहता ने दलील देते हुए कहा कि ऐसा आदेश रिकॉर्ड पर एक सेकंड भी नहीं रहना चाहिए और जवाब दाखिल करने के लिए एक हफ्ते से ज्यादा का समय नहीं मिलना चाहिए।मेहता का तर्क था कि निचली अदालत का पूरा रिकॉर्ड उपलब्ध है, इसलिए विस्तृत जवाब की जरूरत नहीं है।हालांकि आरोपियों के वकीलों ने दलील दी है कि कोई जल्दबाजी नहीं है और उन्हें जवाब तैयार करने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।

आम आदमी पार्टी के नेताओं की तरफ से पेश हुए सीनियर वकीलों ने कोर्ट को बताया किया कि वे ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश के खिलाफ पहले ही सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुके हैं।इस पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से कार्यवाही पर रोक का कोई औपचारिक आदेश नहीं मिल जाता,तब तक हाई कोर्ट में मामला आगे बढ़ता रहेगा।कोर्ट ने प्रक्रिया को जारी रखते हुए सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने की अनुमति दे दी है।

बता दें कि बीते माह फरवरी में 27 को ट्रायल कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया सहित सभी 21 लोगों को बरी कर दिया था।कोर्ट ने सीबीआई की खिंचाई करते हुए कहा था कि उसकी कहानी न्यायिक जांच में टिकने के लायक नहीं है और पूरी तरह से काल्पनिक है।निचली अदालत के मुताबिक कथित साजिश केवल अटकलों पर आधारित थी और कोई भी स्वीकार्य सबूत पेश नहीं किया गया था। कोर्ट ने माना था कि बिना किसी कानूनी सबूत के आरोपियों को आपराधिक मुकदमे की कठोरता का सामना करने के लिए मजबूर करना न्याय के हित में नहीं होगा।

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