मुंबई।रामायण में वर्णित जिस नासिक क्षेत्र में जटायु ने मां सीता को बचाने के लिए रावण से युद्ध किया था।नासिक क्षेत्र अब भारतीय गिद्धों के लिए सबसे अनुकूल प्राकृतिक आवास क्षेत्र सिद्ध होने जा रहा है।महाराष्ट्र के इस क्षेत्र में संकटग्रस्त भारतीय गिद्धों के संरक्षण अभियान को बड़ी सफलता मिलती दिख रही है।
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी (बीएनएचएस) के शोधकर्ताओं ने पुनर्वासित भारतीय गिद्ध जे132 को तीसरे प्रयास में सफलतापूर्वक प्राकृतिक वातावरण में स्थापित करने में कामयाबी हासिल की है। जे132 गिद्ध लगातार 56 दिनों तक जंगल में विचरता रहे और इस दौरान 1618 किलोमीटर से अधिक की उड़ान भरते हुए अपने प्राकृतिक व्यवहार और जीवित रहने की क्षमता का सफल प्रदर्शन किया।
जे132 गिद्ध को पहली बार 11 दिसंबर 2025 को पेंच टाइगर रिजर्व से गिद्धों के दूसरे बैच के साथ छोड़ा गया था। पहली बार मुक्त किए जाने के बाद महज 20 दिनों में 750 किलोमीटर से अधिक की दूरी तय कर नासिक तक पहुंचने की क्षमता दिखाई, लेकिन उसकी शारीरिक स्थिति देखते हुए उसे दोबारा पकड़ लिया गया। वर्ष 2026 की शुरुआत में दूसरा प्रयास भी किया गया, जबकि तीसरी बार उसे सात जून, 2026 को नासिक में छोड़ा गया।
इस बार वैज्ञानिकों को आशंका थी कि जे132 गिद्ध जंगल में स्वतंत्र रूप से जीवन जीने के लिए आवश्यक व्यवहार सीख पाएगा। हालांकि जे132 गिद्ध ने सभी आशंकाओं को पीछे छोड़ते हुए लगातार 56 दिन जंगल में रहकर अपनी दिशा पहचानने की क्षमता, उपयुक्त आवास चुनने की प्रवृत्ति और जीवित रहने के स्वाभाविक कौशल का परिचय दिया।
बीएनएचएस द्वारा टेलीमेट्री तकनीक से उसकी गतिविधियों की लगातार निगरानी की गई।आंकड़ों के मुताबिक जे132 गिद्ध ने प्रतिदिन नियमित उड़ान भरी और 17 जून को एक ही दिन में 168 किलोमीटर की सर्वाधिक दूरी तय की। वह नासिक के उत्तरी हिस्से के प्रमुख गिद्ध आवासों तक पहुंचा और महाराष्ट्र-गुजरात सीमा और वलसाड क्षेत्र में भी नियमित रूप से विचरण करता रहा।मानसून के दौरान भी जे132 गिद्ध ने पूरी तरह जंगली प्रवृत्ति का प्रदर्शन किया। जुलाई के अंतिम सप्ताह में भारी बारिश के दौरान वह सुरक्षित स्थान पर स्थिर रहा और मौसम सामान्य होने के बाद फिर सक्रिय हो गया।
बीएनएचएस के निदेशक किशोर रीठे के मुताबिक फील्ड टीमों ने जे132 गिद्ध को नासिक के डोल ओहोल और देवडोंगरा क्षेत्र में जंगली गिद्धों के साथ देखा। वह स्वतंत्र रूप से मवेशियों के शव खोजकर अन्य गिद्धों के साथ भोजन करता भी पाया गया, जो उसके पूर्ण व्यवहारिक अनुकूलन का प्रमाण है।
बीएनएचएस के शोधकर्ता मानसिंह महादेव का कहना है कि जे132 की सफलता से स्पष्ट है कि उत्तर नासिक का दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र गंभीर रूप से संकटग्रस्त गिप्स प्रजाति के गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण प्राकृतिक आवास है। अध्ययन से प्राप्त आंकड़े भविष्य में गिद्ध संरक्षण और पुनर्वास कार्यक्रमों को और प्रभावी बना सकते हैं।