बंगाल में कैसे धराशाई हुआ ममता का किला,कैसे 7.44% वोट स्विंग ने बीजेपी को दिलाई ऐतिहासिक जीत
बंगाल में कैसे धराशाई हुआ ममता का किला,कैसे 7.44% वोट स्विंग ने बीजेपी को दिलाई ऐतिहासिक जीत

06 May 2026 |   40



बंगाल में कैसे धराशाई हुआ का किला,कैसे 7.44% वोट स्विंग ने बीजेपी को दिलाई ऐतिहासिक जीत

बीजेपी की जीत में क्या रहा एक्स फैक्टर,मोदी-शाह की जोड़ी या योगी की दहाड़

धनंजय सिंह 

लखनऊ।पश्चिम बंगाल में 15 साल बाद सत्ता का परिवर्तन हुआ है। 2011 में तृणमूल कांग्रेस की मुखिया ममता बनर्जी एक बड़ा परिवर्तन लेकर आई थीं और 34 साल से सत्ता पर काबिज कम्यूनिस्ट पार्टी को उखाड़ फेंका था।ममता मुख्यमंत्री बनीं और लगातार 3 चुनाव जीतकर 15 साल तक पश्चिम बंगाल पर राज किया,लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने ममता सरकार के साथ वही किया जो 2011 में हुआ था।बीजेपी 207 सीटें जीतकर सांस्कृतिक, भौगोलिक और राजनीतिक रूप से मजबूत राज्य में अब पहली बार सरकार बनाने जा रही है।वहीं टीएमसी सिर्फ 80 सीट ही जीत पाई।

ममता खुद हार ग‌ईं अपनी सीट

ममता बनर्जी खुद अपनी भवानीपुर सीट से हार गईं। ममता को भाजपा के सुवेंदु अधिकारी ने 15 हजार से अधिक वोटों से हराया है।अब सबसे बड़ा सवाल ये उठ रहा है कि 2016 में 3 सीट जीतने वाली भाजपा 10 साल में स्पष्ट बहुमत तक कैसे पहुंची। 15 साल तक पश्चिम बंगाल पर राज करने वाली ममता से सत्ता कैसे छिटक गई।आइए जानते हैं आखिर ये सब कैसे हुआ और इसका देश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।

भाजपा का बंगाल, 7.44 फीसदी वोट स्विंग ने किया खेला

293 विधानसभा सीटों वाले पश्चिम बंगाल में भाजपा ने 207 सीटों पर विजय का परचम लहरा कर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।भाजपा ने लगभग 70 फीसदी का स्ट्राइक रेट हासिल किया।टीएमसी सिर्फ 80 सीटें ही जीत पायी। टीएमसी का स्ट्राइक रेट लगभग 27.6 फीसदी रहा। 2 सीट कांग्रेस और 2 पर आम जनता उन्नयन पार्टी ने जीत दर्ज की।एक सीट कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (मार्क्सवादी) और एक सीट ऑल इंडिया सेक्युलर फ्रंट ने भी जीती है।इन सबके बीच भाजपा को 2021 में जहां 38.4 फीसदी वोट मिले थे,वहीं 2026 में 45.84 फीसदी वोट मिले।यानी 7.44 फीसदी वोट भाजपा के बढ़े।लगभग इतने ही वोट टीएमसी के घटे। टीएमसी को 2021 में जहां 48.5 फीसदी वोट मिले थे,वहीं 2026 में 40.80 फीसदी वोट मिले। यानी 7.7 फीसदी वोटों में कमी आई।माना जा रहा है कि यही वोट भाजपा के खाते में गए और उसे ऐतिहासिक जीत दिला गए।

जहां ज्यादा वोटिंग वहां बीजेपी को फायदा

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ज्यादा मतदान भी बीजेपी के पक्ष में गया। विधानसभा चुनाव के नतीजों के मुताबिक सिर्फ एक सीट ऐसी थी,जहां पर वोटर टर्नआउट 40-50 फीसदी रहा,जिस पर टीएमसी को जीत मिली।वहीं 4 सीटें ऐसी रहीं जिन पर वोटर टर्नआउट 50-60 फीसदी रहा,इनमें बीजेपी ने 1 और टीएमसी ने 3 सीटें जीतीं। 60-70 फीसदी टर्नआउट वाली 11 सीटें रहीं,जिनमें बीजेपी ने 5 और टीएमसी ने 6 सीटें जीतीं। 70-80 फीसदी टर्नआउट वाली 30 सीटों में बीजेपी ने 19, टीएमसी ने 10 और AISF ने 1 सीट जीती। वहीं 136 सीटों पर 80-90 फीसदी टर्नआउट रहा, जिसमें बीजेपी ने 102 सीटें और टीएमसी ने 34 सीटें जीतीं। चुनाव में 111 सीटें ऐसी रहीं,जहां पर वोटर टर्नआउट 90 फीसदी या उससे ज्यादा रहा।इनमें बीजेपी को 79, टीएमसी को 27, कांग्रेस को 2, आम जनता उन्नयन पार्टी को 2 और CPI(M) को 1 सीट मिली।

ममता खुद चुनाव हारीं,12 मंत्री भी नहीं जीत पाए अपनी सीट

पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजों में खास बात यह रही कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद तो चुनाव हारी हीं, उनके 12 मंत्री भी चुनाव हार गए।महिला और बाल कल्याण मंत्री शशि पांजा,उदयन गुहा,ब्रत्य बसु,चंद्रिमा भट्टाचार्य,सुजीत बसु, सिद्दीकुल्लाह चौधरी,रथिन घोष,बेचाराम मन्ना,बिरबाहा हंसदा, मोलय घटक चुनाव हार गए।

ममता की हार का क्या है कारण

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी को मिली करारी हार के कई कारण हैं।इनमें महिला सुरक्षा,आरजी कर रेप केस, I-PAC पर छापा, मुर्शिदाबाद में हिंसा जैसे कई मुद्दों के कारण बंगाल की जनता ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता चुना।

आरजीकर रेप केस,महिला सुरक्षा का सवाल

कोलकाता के आरजीकर मेडिकल कॉलेज की छात्रा से दुष्कर्म और हत्या के मामले ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस मामले के बाद ममता बनर्जी की सरकार पर लॉ एंड ऑर्डर को लेकर सवाल उठने लगे थे।घटना के बाद बीजेपी और कांग्रेस ने ममता सरकार को निशाने पर लिया। विधानसभा चुनाव में भाजपा ने पानीहाटी सीट से आरजीकर रेप पीड़िता की मां को अपना उम्मीदवार बना दिया,जिन्होंने जीत भी दर्ज की।

ईडी की कार्रवाई, I-PAC पर छापा

जनवरी 2026 में पश्चिम बंगाल में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी ) की टीम कोलकाता पहुंची और पॉलिटिकल कंसल्टेंसी फर्म I-PAC से जुड़े ठिकानों पर छापामारी की।ममता बनर्जी खुद उस दफ्तर में पहुंच गईं,जहां ईडी छानबीन कर रही थी। दरअसल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही I-PAC टीएमसी के साथ काम कर रही थी। जांच में पता चला कि कोयला चोरी घोटाले का धन I-PAC तक पहुंचा है। ईडी के मुताबिक इस पैसे का इस्तेमाल गोवा विधानसभा चुनाव में I-PAC ने टीएमसी के प्रचार के लिए किया।ईडी की कार्रवाई का असर ममता की छवि पर पड़ा।ममता का नाम भ्रष्टाचार के मामले में सामने आया।

मुर्शिदाबाद हिंसा ने ममता को पीछे धकेला

अप्रैल 2025 में मुर्शिदाबाद में हिंसा हुई थी।इस हिंसा ने ममता बनर्जी सरकार की छवि धूमिल कर दी। दरअसल मुर्शिदाबाद के जंगीपुर में वक्फ कानून के खिलाफ चल रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया था,तोड़फोड़,आगजनी,नेशनल हाईवे और ट्रेन यातायात को रोकने की कोशिश भी की गई।इस घटना के बाद से विपक्ष ने आरोप लगाने शुरू किए कि ममता अपने राज्य में हिंसा रोकने की जगह उसे बढ़ावा देती हैं।

पाड़ा क्लब ने डुबोई नाव

2026 विधानसभा चुनाव में भ्रष्टाचार एक केंद्रीय मुद्दा रहा। विभिन्न घोटालों और स्थानीय स्तर पर कट मनी के आरोपों से ममता के टीएमसी की छवि को नुकसान हुआ।इसमें पाड़ा क्लब की कट मनी वसूली ने आग में घी का काम किया।पाड़ा क्लब कोलकाता के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। साल 2011 में सत्ता में आने के बाद ममता ने लोगों से जुड़ाव का सबसे अहम जरिया इन पाड़ा क्लबों को बनाया।पाड़ा मतलब मोहल्ला होता है और ये ऐसी जगह होती है,जहां लोग बैठकर कैरम,लूडो और पत्ते खेलते हैं।दुर्गा पूजा का आयोजन भी यही पाड़ा क्लब कराते हैं।ममता सरकार इन पाड़ा क्लबों को भरपूर धनराशि देती थी,इन क्लबों के सदस्य टीएमसी के कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं,क्लबों को बिजली बिल में 80 पर्सेंट छूट, सरकारी कैंप लगाने पर कमीशन मिलता है। सरकार कई योजनाओं के लिए सीधे इन्हीं क्लबों को ही पैसा देती थी,यही क्लब ममता सरकार में कट मनी का सबसे बड़ा अड्डा बने।यह क्लब राज्य में कट मनी वसूलते थे।

एस‌आई का विरोध और सत्ता विरोधी लहर ममता को ले डूबी

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एस‌आईआर) पूरे देश में हुआ लेकिन,इसको लेकर सबसे ज्यादा सियासत पश्चिम बंगाल में हुई।ममता बनर्जी और उनकी सरकार ने इसे लेकर चुनाव आयोग के साथ-साथ बीजेपी को भी घेरा।ममता बनर्जी और चुनाव आयोग के बीच तीखी बहस भी चलती रही।मुद्दा सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा और चुनाव होने से ठीक पहले तक भी कोर्ट में इस मामले को लेकर सुनवाई चलती रही।एसआईआर प्रक्रिया के दौरान 90 लाख से ज्यादा नाम हटाए गए।एस‌आईआर में 63 फीसदी (लगभग 57.47 लाख) हिंदू और 34 फीसदी (लगभग 31.1 लाख) मुस्लिमों के नाम कटे।बड़ी संख्या में फर्जी या मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में सत्ता विरोधी लहर होने का भी नुकसान ममता को हुआ।ममता अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार,हिंसा जैसे मुद्दों से घिर गईं,इसके चलते चुनाव में ममता को हार का सामना करना पड़ा।

बीजेपी की ऐतिहासिक जीत में किन मुद्दों का साथ

पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से क्षेत्रीय बनाम राष्ट्रीय की रही है,लेकिन हर बार क्षेत्रीय दलों की ही जीत होती रही।मगर इस बार बड़ा परिवर्तन देखने को मिला। इस बार बीजेपी ने न केवल अपने संगठना को मजबूत किया,बल्कि चुनावी रणनीति,नैरेटिव और बूथ स्तर तक पहुंच में भी सुधार किया, इसका असर सीटों की संख्या पर दिख भी रहा है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी की वापसी के कई महत्वपूर्ण कारण रहे हैं।

ममता के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर

ममता बनर्जी 2011 में स्ट्रीट फाइटर की छवि के साथ सत्ता में पहुंची थीं,लेकिन ममता अपने 15 साल के कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार,कट मनी और हिंसा जैसे मुद्दों से घिर गईं। 2026 विधानसभा चुनाव में भाजपा ने भ्रष्टाचार,बेरोजगारी, अपराध,टीएमसी कार्यकर्ताओं की दबंगई को बड़े जोर-शोर से मुद्दा बनाया और जनता तक पहुंचाया।भाजपा ने आरोप लगाया कि टीएमसी के कार्यकर्ता हिंसा में शामिल रहते हैं। संदेशखाली जैसी घटनाओं को बीजेपी ने मुद्दे के रूप में उठाया। बीजेपी ने इसे कानून का राज बनाम राजनीतिक संरक्षण के रूप में पेश किया।

बंपर वोटिंग ने बदल दिया समीकरण

पश्चिम बंगाल में इस बार,जहां पहले चरण में 93.19 फीसदी मतदान हुआ, वहीं दूसरे चरण में 92.67 फीसदी लोगों ने मतदान किया।यानी कुल औसत मतदान 92.93 फीसदी रहा, जो देश में किसी प्रदेश में मतदान का नया रिकॉर्ड है।ये बंपर मतदान भी समीकरण बदलने वाला फैक्टर रहा है।आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में लगभग हर पांचवां मतदाता वोट देने निकला। पश्चिम बंगाल के संवेदनशील इलाकों,जंगलमहल, उत्तर बंगाल और सीमावर्ती क्षेत्रों में भी भारी मतदान हुआ। महिलाओं के साथ ही पहली बार वोट देने वाले युवाओं की भागीदारी इस बार बढ़ी है।

युवाओं ने टीएमसी को नकारा

चुनाव में युवा मतदाता निर्णायक बनकर उभरे। चुनाव आयोग के मुताबिक पश्चिम बंगाल में कुल मतदाता 6.44 करोड़ हैं, इनमें 1.4 से 1.7 करोड़ युवा (18-29 आयु वर्ग) हैं। 18 से 19 वर्ष के 5.2 लाख से अधिक युवा पहली बार मतदान कर रहे थे।यानी हर चौथा मतदान करने युवा था।ऐसे में बेरोजगारी,भर्ती घोटाले,सिस्टम में भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों से यह वर्ग नाराज दिखाई दिया। 2026 में युवाओं की भागीदारी 22-26 फीसदी के बीच पहुंच गई। भले ही संख्या बहुत बड़ी न हो,लेकिन चुनाव परिणाम बदलने इसने असर जरूर डाला। दरअसल शिक्षक भर्ती घोटाले से जुड़ीं 26 हजार नियुक्तियां रद होने के फैसले के बाद युवाओं में गुस्सा दिखा।लंबे समय तक चले आंदोलन ने सरकार के खिलाफ माहौल तैयार किया।

चुनाव आयोग की रणनीति ने नहीं होने दी हिंसा

जब भी पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए हैं वहां हिंसा जरूर देखने को मिली है।चुनाव और हिंसा का गठजोड़ था,लेकिन इस बार अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण मतदान ने चुनावी परिणामों को प्रभावित किया।चुनाव आयोग की ओर से भारी संख्या में केंद्रीय बलों की तैनाती,संवेदनशील बूथों की पहचान और प्रशासनिक अधिकारियों के तबादलों ने माहौल बदल दिया।सुरक्षाबलों की भारी तैनाती से वह मतदाता भी बाहर निकले जो सत्ता विरोधी होते थे,लेकिन डर से मतदान नहीं करते थे।सुरक्षाबलों की भारी मौजूदगी से रिकॉर्ड मतदान हुआ,जिसने सत्ता विरोधी लहर को वास्तविक मतदान में बदला दिया।

भाजपा ने बदली रणनीति,बदला नतीजा

भाजपा ने इस चुनाव में अपनी रणनीति में काफी बदलाव किया।भाजपा ने व्यक्तिगत प्रहारों के बजाय 15 साल की एंटी इंकंबेंसी और प्रशासनिक विसंगतियों को ढाल बनाया।मुरमुरा- चाय पर चर्चा,झालमुड़ी का स्वाद,फ्लैट के लिए 5 लाख का दांव,ममता की राजनीति की काट के तौर पर चला गया।पीएम मोदी और भाजपा का शीर्ष नेतृत्व ममता पर सीधे हमलावर नहीं दिखा,जिसे पिछले चुनाव में हार का सबसे बड़ा कारण माना गया था।भाजपा ने इस बार चुनाव मोदी बनाम ममता नहीं बनने दिया,जिससे ध्रुवीकरण सीमित रहा।

सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी ने भी बदला नतीजा

 बंगाल में टीएमसी की हार का एक बड़ा कारण सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी को भी माना जा रहा है।दरअसल राज्य कर्मचारियों को अभी छठे वेतन आयोग के हिसाब से सैलरी दी जा रही है।ममता ने अभी तक सातवां वेतन आयोग लागू नहीं किया था,जहां देश भर में आठवें वेतन आयोग को लागू करने की बात चल रही है, वहीं बंगाल में सातवां भी नहीं मिल रहा था,इससे कर्मचारियों में नाराजगी थी,जबकि भाजपा ने अपने प्रचार में आश्वासन दिया था कि सातवां वेतन आयोग तुरंत लागू किया जाएगा।

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