अयोध्या दीपोत्सव 2026:रामनगरी को रोशन करेंगे गांव की बेटियों के हाथों बने दीये,1.60 लाख दीपों में छिपी आत्मनिर्भरता की कहानी
अयोध्या दीपोत्सव 2026:रामनगरी को रोशन करेंगे गांव की बेटियों के हाथों बने दीये,1.60 लाख दीपों में छिपी आत्मनिर्भरता की कहानी

29 Oct 2026 |   26



 

अयोध्या।रामनगरी अयोध्या की गलियों और घाटों पर जब इस बार दीपोत्सव के दौरान लाखों मिट्टी के दीये जगमगाएंगे,तब उनकी रोशनी में सिर्फ रामनगरी की आभा ही नहीं,बल्कि गांवों में मेहनत करने वाली महिलाओं के हुनर की चमक भी दिखाई देगी।बाराबंकी जिले के कजियापुर,ग्रामीण पर्यटन ग्राम भगहर झील और अयोध्या के ग्यासपुर की 25 से अधिक महिलाएं इस बार दीपोत्सव के लिए लगभग 1.60 लाख पारंपरिक मिट्टी के दीये तैयार कर रही हैं।प्रति दीया आठ रुपये की निर्धारित दर से जुड़ा यह काम ग्रामीण महिलाओं के लिए अतिरिक्त आमदनी और अपनी पारंपरिक कला को पहचान दिलाने का अवसर बन रहा है।

यह पहल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन को ग्रामीण पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प और महिला सशक्तिकरण...

यह पहल धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन को ग्रामीण पर्यटन, स्थानीय हस्तशिल्प और महिला सशक्तिकरण से जोड़ने की कोशिश के रूप में सामने आई है।गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही कुम्हारी कला अब बड़े आयोजन की जरूरत से जुड़कर स्थानीय कारीगरों के लिए काम का अवसर तैयार कर रही है। इससे मिट्टी के दीये बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाने के साथ महिलाओं की आर्थिक भागीदारी को भी प्रोत्साहन मिल रहा है।

दीपोत्सव की रोशनी में ग्रामीण हुनर की चमक

रामनगरी का दीपोत्सव धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक विरासत का प्रमुख आयोजन बन चुका है।इस साल इसका दसवां संस्करण आयोजित होने जा रहा है।दीपोत्सव में 30 लाख से अधिक दीये जलाने की योजना है। इतने बड़े आयोजन के लिए दीयों की तैयारी में स्थानीय कारीगरों को शामिल करना ग्रामीण उत्पादन को व्यापक मंच देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।बाराबंकी और अयोध्या की महिलाएं अपने हाथों से मिट्टी को आकार देकर ऐसे दीये बना रही हैं,जो दीपोत्सव की पारंपरिक सजावट का हिस्सा बनेंगे। उनके लिए यह केवल दीये बनाने का काम नहीं,बल्कि अपने हुनर को बड़े सांस्कृतिक आयोजन से जोड़ने का अवसर भी है।गांव के चाक पर तैयार होने वाला उत्पाद जब रामनगरी के उत्सव तक पहुंचता है, तो स्थानीय कला और बाजार के बीच एक नया संबंध बनता है।

पर्यटन को रोजगार से जोड़ने की कोशिश

यूपी में ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने का उद्देश्य केवल पर्यटकों को नए स्थानों तक पहुंचाना नहीं,बल्कि गांवों की कला,संस्कृति,खानपान,हस्तशिल्प और स्थानीय परंपराओं को आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना भी है।ग्रामीण पर्यटन ग्राम भगहर झील जैसी पहल के माध्यम से स्थानीय हुनर को पहचान दिलाने और ग्रामीण परिवारों के लिए आजीविका के अवसर बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।उत्तर प्रदेश पर्यटन विभाग ग्रामीण कला,संस्कृति,परंपराओं और स्थानीय उत्पादों को पर्यटन से जोड़कर रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। दीपोत्सव के लिए दीये बनवाने की पहल भी इसी सोच का हिस्सा है।इससे महिलाओं के पारंपरिक कौशल को बड़े आयोजन से जोड़कर उनकी आय बढ़ाने के अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।

आठ रुपये प्रति दीया, मेहनत को मिला बाजार

दीया निर्माण से जुड़ी महिलाओं को प्रति दीया आठ रुपये की दर निर्धारित की गई है। लगभग 1.60 लाख दीयों के इस काम से जुड़ी कुल राशि लगभग 12.80 लाख रुपये बैठती है। हालांकि यह कुल निर्धारित दर के आधार पर निकाली गई राशि है,इसे किसी एक महिला की कमाई या शुद्ध लाभ नहीं माना जा सकता।वास्तविक आमदनी इस बात पर निर्भर करेगी कि उत्पादन में कितनी महिलाओं की भागीदारी है, काम का बंटवारा कैसे होता है और निर्माण से जुड़ी लागत किस प्रकार वहन की जाती है। इसके बावजूद बड़े ऑर्डर से ग्रामीण कारीगरों को एक निश्चित मात्रा में उत्पादन का अवसर मिलता है। स्थानीय स्तर पर काम मिलने से उन्हें अपने कौशल का उपयोग करने और परिवार की आय में योगदान देने का रास्ता मिलता है। पारंपरिक कला से जुड़े परिवारों के लिए ऐसे अवसर खास महत्व रखते हैं, क्योंकि इससे उनके उत्पादों की मांग गांवों से बाहर भी पहुंच सकती है।

महिलाओं के हुनर से परिवारों को सहारा

दीया निर्माण से जुड़ी सुंदरा,साविधि और मीना ने बताया कि पारंपरिक कला के आधार पर काम मिलने से वे अपने परिवार की आमदनी में योगदान कर पा रही हैं।वहीं राजेश्वरी,वीरमति और रीना के मुताबिक ऐसे अवसर महिलाओं को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने के साथ अपने हुनर की पहचान बनाने में मदद करते हैं।कुम्हारी कला भारतीय ग्रामीण जीवन और त्योहारों की परंपरा से गहराई से जुड़ी हुई है।मिट्टी के दीये पूजा-पाठ और दीपावली जैसे पर्वों का अभिन्न हिस्सा हैं,लेकिन बदलती बाजार व्यवस्था में पारंपरिक कारीगरों के लिए नियमित मांग और उचित बाजार तक पहुंच बनाए रखना चुनौती हो सकती है। बड़े आयोजनों से मिलने वाला काम इस चुनौती को कुछ हद तक कम करने और स्थानीय कला को जीवित रखने में मदद कर सकता है।

पारंपरिक कला को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अवसर

कुम्हारी कला केवल एक उत्पाद बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि अनुभव और पीढ़ियों से संचित कौशल का हिस्सा है। मिट्टी की पहचान,उसे गूंथने,आकार देने और दीये तैयार करने में अभ्यास की जरूरत होती है।जब इस काम को बड़े पैमाने पर अवसर मिलता है, तो अनुभवी कारीगरों के कौशल का उपयोग होता है और नई पीढ़ी के लिए भी इस परंपरा से जुड़ने की संभावना बनती है।ग्रामीण पर्यटन की सफलता के लिए जरूरी है कि स्थानीय लोगों को केवल पर्यटन गतिविधियों का दर्शक न बनाया जाए,बल्कि उन्हें उत्पादन,सेवा और स्थानीय उद्यम के माध्यम से प्रत्यक्ष भागीदारी मिले।दीया निर्माण जैसी पहल इस दिशा में एक उदाहरण प्रस्तुत करती है। भविष्य में स्थानीय हस्तशिल्प को नियमित बाजार, बेहतर विपणन और स्थायी ऑर्डर से जोड़ने पर ग्रामीण कारीगरों को अधिक लाभ मिल सकता है।

ग्रामीण समृद्धि की दिशा में पहल

ग्रामीण पर्यटन तभी सार्थक होगा,जब गांवों की परंपराएं और स्थानीय हुनर लोगों की आजीविकाका मजबूत आधार बनें। दीपोत्सव के लिए ग्रामीण महिलाओं द्वारा तैयार किए जा रहे 1.60 लाख मिट्टी के दीये कुम्हारी कला को पहचान देने, महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति देने का अवसर हैं।दीपोत्सव की तैयारियों में शामिल ये महिलाएं दिखा रही हैं कि स्थानीय कला को बड़े सांस्कृतिक आयोजनों से जोड़कर रोजगार की संभावनाएं पैदा की जा सकती हैं।जब रामनगरी में दीयों की लौ जगमगाएगी, तब उसके पीछे गांवों में हुई मेहनत और हुनर की कहानी भी होगी। यह पहल ग्रामीण पर्यटन को आजीविका से जोड़ने की दिशा में एक प्रयास है,जिसकी दीर्घकालीन सफलता स्थानीय कारीगरों को लगातार काम, उचित पारिश्रमिक और बाजार तक बेहतर पहुंच मिलने पर निर्भर करेगी।

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